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अंधेरी खंदकों में सत्ताओं के खुले आकाश की तलाश!

गुरुवार,जून 4, 2020
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पृथ्वी व प्रकृति का घेरा या आवरण पर्यावरण कहलाता है। जो वायु, जल, भूमि, गगन, सूर्य का प्रकाश एवं समस्त प्राणियों (मनुष्य सहित) से मिलकर बनता है। इस पर्यावरण को समस्त जीव प्रभावित भी करते हैं
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दुनिया के लोगों के मन आज भय से व्याकुल हैं। दुनियाभर की राजकाज की व्यवस्थाओं, समाजों और मनुष्यों के मन में जो चिंता और भय अपने जीवन की सुरक्षा और जनजीवन की गतिशीलता के बारे व्याप्त हो गया है, उससे आज की दुनिया कैसे उबरे? यह वह सवाल है जिसे लेकर आप, ...
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लेक‍िन जो घटनाएं ‘ट्रस्‍ट एंड ब‍िट्रेड’ की होती हैं वहां शायद इट ऑल डजन्‍ट वर्क!
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कविता ‘अग्निपथ’ की तर्ज पर लिखी गई थी। इसे कोरोना के प्रति जागरुकता के लिये राजस्थान पुलिस ने प्रचारित किया था।
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पर्यावरण संरक्षण महज ड्राफ्टिंग, गोष्ठियों और पैकेजों के रुप में आर्थिक गबन का पर्याय बनते जा रहा है।
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हे गजानन कहां हो तुम? तुम्हें जरा भी उसकी गुहार, दर्द, तड़प, पीड़ा दिखाई-सुनाई नहीं दी? हे देवों के देव वक्रतुंड, महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ।।।कितने निष्ठुर हो गए तुम भी? हे सुमुख, उस निर्दोष गर्भवती हथिनी मां के मुख में उन विश्वास घातियों ने जो आग ...
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अलौकिक प्राणियों के अस्तित्व पर शायद आप यह मानकर विश्वास न करते हों कि आज की दुनिया में उनका जीवित रह पाना असंभव है। लेकिन यह तो संभव है ही कि कभी उनका अस्तित्व रहा हो और यह कोरी कल्पना न हो। वैसे यह भी एक मान्यता है कि जो कुछ भी मानव की कल्पना में ...
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तुम्हें अपने घर-आंगन की खबर ही कहां है? तुम तो यह भी भूल गए कि परसों नुक्कड़ के उस पेड़ को काट दिया गया जिसकी इमलियाँ तुम रोज अपने जेब में भर कर ले जाते थे और उन्हीं के कारण स्कूल में कई दोस्त बने थे तुम्हारे। हां, सड़क बनाने के लिए उस पेड़ को काट दिया।
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हम में से हर कोई अपने दिमाग से कोई न कोई उपाय सोच कर धरती के क्षति ग्रस्त पर्यावरण को दुरुस्त करने में सहभागी बन पुण्य कमा सकता है।
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"मैं और मेरे साथ भी मैं" वाला जो फंडा है वही इस जिंदगी का सबसे अहम रहस्य है। जिसने इसे समझ लिया उसने जीवन जी लिया। अपने जीवन के चौपन बरस इस फलसफे पर ही चले हैं। मेरे साथ मैं की जो परिभाषा है वो कुछ अलग है।
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’दादाजी, मैं साइकिल चलाना नहीं सीखूंगी।’ दादाजी ने अखबार से चेहरा निकालते हुए पूछा, ’क्यों? गिर पड़ी क्या?’
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लगभग 12 वर्ष पूर्व जब बराक ओबामा पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे तो दुनियाभर में यह माना गया था कि यह मुल्क अपने इतिहास की खाई (नस्लभेद और रंगभेद) को पाट चुका है। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ओबामा के कार्यकाल में ही वहां नस्लवादी और ...
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माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के आयोजन ‘हिन्दी पत्रकारिता सप्ताह’ के अंतर्गत कहानीकार सुश्री प्रियंका ओम ने ‘सृजनात्मक लेखन’ विषय पर जहां अपने विचार रखें
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लॉकडाउन को हम जीवनरक्षा की समझ का खुला विश्वविद्यालय भी मान सकते हैं। इससे पहले किसी महामारी से सारी दुनिया का इतना व्यापक लोक शिक्षण नहीं हुआ। लॉकडाउन ने आज तक हम जिस तरह बिना चिंता के लापरवाह अंदाज में जीते रहने के आदी थे, उसे इतिहास का हिस्सा बना ...
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क्या कलाएं अपने होने या रचे जाने का समय चुनती हैं, जैसे मृत्यु के घटने का समय तय है।
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देश जब दिक्कतों का सामना कर रहा हो, जनता या तो घरों में बंद हो या सड़कों पर पैदल चल रही हो, आपदा प्रबंधन के तहत सारी शक्तियां कुछ व्यक्ति-समूहों में केंद्रित हो गई हों, उस स्थिति में अदालतों, विपक्ष और मीडिया को क्या काम करने चाहिए?
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सदियों से प्रकृति के तमाम जीव-जंतुओं की दी जाती रही बलि, मनुष्य की जीभ की तुष्टि के लिए या
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वर्षों से देखा सबने, सुंदर सफेद परिधानों से सज्जित, सदा अपने अधरों पर लिए, मधुर मुस्कान, वो तरुणाई।
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मुम्बई में एक फिल्म अभिनेता सोनू सूद जाने कहां से आया, और बेबस मजदूरों की मदद पर उतारू हो गया।
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