रूपम पाठक : दोषी या 'देवी'?
मंच अपना
विगत मंगलवार यह खबर सुर्खियों में रही कि बिहार में रूपम पाठक नाम की महिला ने विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या कर दी। रूपम ने विधायक पर यौन शोषण का आरोप लगाया। मामले की जाँच अब सीबीआई करेगी। रूपम पाठक ने यूँ तो कानून को हाथ में लिया है इसलिए चाहते हुए भी उनके साहस की प्रशंसा नहीं की जा सकती। लेकिन यह घटना एक गंभीर संकेत है। निरंतर फैलते व्यभिचार और पुरुषों की बढ़ती निर्लज्जता के लिए एक सबक भी। आखिर 'इज्जत' जैसा शब्द औरतों के साथ जोड़कर यह समाज बरसों से उसके साथ खिलवाड़ ही तो करता रहा है। अपनी अस्मिता को छले जाने पर रूपम चारों तरफ न्याय की गुहार लगाती रही। मगर जब वह हताश हो गई तो उसे अपने लिए 'न्याय की देवी' खुद बनना पड़ा। एक पुरुष जब यौन शोषण जैसे घृणित कृत्य को अंजाम देता है तो तमाम कानूनों के बावजूद वह समाज में मर्द और 'विजेता' होने का खिताब पा जाता है। उसके 'विकार' धिक्कारे नहीं जाते। लेकिन एक बेबस स्त्री इस कुंठित अहसास को पाल बैठती है कि उसने इज्जत गँवा दी। समझ में नहीं आता कि एक जो जबरन अत्याचार कर रहा है वह 'कापुरुष' नहीं समझा जाता और वह जो अपने आपको बचाने के लिए छटपटाती रही उसके लिए लफ्ज कि उसकी इज्जत लूट ली गई। गोया कि पुरुष की कोई इज्जत नहीं होती? अगर होती तो कहा यह जाना चाहिए कि एक पुरुष ने स्त्री के साथ जोर-जबरदस्ती करते हुए अपनी इज्जत गँवा दी। यकीनन समाज की शब्दावली और व्यवहार ऐसा होता तो बलात्कार करने वाला आत्महत्या को बाध्य होता ना कि शोषण की शिकार महिला को उसकी हत्या करनी पड़ती। जबरन दैहिक रिश्ते की परिधि में पुरुष आततायी की भूमिका में होता है और स्त्री निरीह और नाजुक। पापाचार सहने की भी एक सीमा होती है। सहनशक्ति भी अपने चरम पर पहुँच कर चरमरा जाती है। रूपम ने वही किया जो व्यवस्थाओं को खंडहर में बदलते देख किसी भी गैरतमंद और न्याय के लिए छटपटाते इंसान द्वारा कर बैठना सहज-स्वाभाविक है।बात अगर एक स्त्री की जाए तो वह अपना संतुलन इतनी आसानी से नहीं खोती। उसका नैसर्गिक स्वभाव है कि वह सामाजिक मर्यादाओं और नैतिक दायरों का पालन पुरुषों से अधिक करती है। पौराणिक काल से लेकर आज तक का इतिहास गवाह है कि अपने स्त्रीत्व के लिए जब-जब उसे खड़ा होना पड़ा है तब-तब वह अपने रौद्र स्वरूप में ही अभिव्यक्त हुई है। नदी सामान्यत: शांत होती है मगर जब वह अपने किनारों को तोड़ कर उद्दाम आवेग से बहती है तब उसके कलकल-छलछल प्रबल प्रवाह को चट्टानें भी नहीं रोक पाती। जब-जब स्त्री ने अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए हथियारों को हाथ में थामा है, समाज के महाविनाश की ही पृष्ठभूमि तैयार हुई है। सवाल यह उठता है कि मूलत: शांत, सौम्य और संतुलित नारी अचानक अशांत, रौद्र और असंतुलित कैसे हो जाती है? जाहिर है कहीं ना कहीं मन के भीतर जब बहुत कुछ टूटता, ढहता, बिखरता और दरकता है तब जाकर मन का विंध्वंस बाहर आकर तबाही को बाध्य होता है।
रूपम ने जो किया वह सही है ऐसा तो नहीं कहेंगे लेकिन उसने ऐसा कौन सी परिस्थिति के वशीभूत होकर किया, आखिर उसकी उस वक्त की छटपटाहट और वेदना क्या थी, इन पक्षों पर भी न्यायिक दृष्टि से सोचे जाने की आवश्यकता है। चेतावनी तो यह है कि इस देश में जब जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी मट्टू और आरूषि जैसे असंख्य घटनाक्रमों में जबकि न्याय की प्रक्रिया ही थका देने वाली हो तब रूपम जैसी महिलाएँ कहीं आज की नारियों का आदर्श बनकर ना उभर आए। अगर स्त्री को मात्र 'भोग्या' मानने की पुरुषीय प्रवृत्ति पर समय रहते अंकुश नहीं लगा तो संभव है कि देश में 'रूपमों' की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि हो जाए। दैहिक शोषण के बढ़ते आँकड़ों के साथ अगर 'यह आँकड़ा' भी बढ़ने लगे तो सोचिए क्या हालत होगी इस धरा की। रूपम ने क्या सच में 'हत्या' की है या यह भीतर की अपमानजनक अग्नि को सहन ना कर पाने की उसकी एक मजबूरी थी। इस सबके बीच जो एक सुखद मोड़ देखने को मिला वह यह कि रूपम का पति इस सारे प्रकरण में अपनी पत्नी के साथ है। जाहिर है सच्चा पुरुषार्थ यही है।
लेखक के बारे में
स्मृति आदित्य