Manch Apna | सावन को आने दो...
जीवन के रंगमंच से
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यही वह मौसम है जब भाई-बहन का स्नेह भी आलोड़ित होता है रक्षाबंधन के रूप में, देशभक्ति का रस बरसता है 15 अगस्त के रूप में, नागपंचमी के रूप में जीव-जन्तुओं के प्रति संवेदनशीलता जगाता है यह मौसम, वहीं रमजान के पावन दिन भी इसी मौसम में पड़ते हैं।
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वास्तव में धर्म की क्रूरता की हद तक जिद, प्यार जैसे शब्द के स्पर्श मात्र से पिघल सकती है और प्यार जैसे शब्द के नाम पर उच्छ्रंखलता को अपनाने वाले अगर धर्म की मर्यादा, पवित्रता, शालीनता और सिद्धांतों को अपना लें तो प्यार की खोई सात्विकता लौट सकती है।
धर्म ने समय-समय पर जहाँ प्यार को गंभीरता दी है वहीं प्यार ने धर्म को कोमल और उल्लासमय बनाने में अपना 'शिष्ट' सहयोग दिया है। धर्म है क्या? धर्म साथ जीने, रहने और आगे बढ़ने के ऐसे अघोषित सिद्धांत हैं जिन्हें हम स्वेच्छा से अपनाते हैं। ऐसे सिद्धांत जिन्हें हम परंपरागत रूप से आत्मसात करते हैं। दुनिया का कोई धर्म मार-काट, हिंसा, बदला, हत्या (इज्जत के नाम पर) जैसी बातों का समर्थन नहीं करता। फिर प्यार जैसे नाजुक नर्म लफ्ज के प्रति हो रही 'ऑनर किलिंग' को धर्म कैसे माना जा सकता है?
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सावन का खूबसूरत मौसम आने ही वाला है, बस यही कहना है कि धर्म की पवित्रता और रिश्तों की सुंदरता के साथ सावन को आने दो, झूम कर आने दो। यह हम सबके लिए जरूरी है।

