गुरुवार, 26 मार्च 2026
  1. सामयिक
  2. डॉयचे वेले
  3. डॉयचे वेले समाचार
  4. india at these green cafes delhiites come for cleaner air
Written By DW
Last Modified: गुरुवार, 18 दिसंबर 2025 (07:52 IST)

प्रदूषित दिल्ली में साफ हवा देने की कोशिश करते 'ग्रीन' कैफे

दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक पिछले एक महीने से 300 के पार बना हुआ है, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। हवा गंभीर रूप से प्रदूषित है। लोग अब ऐसा अनुभव चाहते हैं जहां उन्हें खाने के साथ साफ हवा भी मिल सके।

green cafe
शिवांगी सक्सेना
भारत की राजधानी दिल्ली में प्रदूषित हवा से बचने के लिए लोग नए तरीके तलाश रहे हैं। अब वे सिर्फ खाने या कॉफी पीने के लिए बाहर नहीं निकलते। बल्कि ऐसी जगह ढूंढ रहे हैं जहां वो सुकून से सांस भी ले सकें। ऐसे में शहर के व्यस्त इलाकों में एक नया ट्रेंड उभर रहा है।
 
दिल्ली और आसपास के इलाकों में 'ग्रीन कैफे' की लोकप्रियता बढ़ रही है। ग्रेटर कैलाश, कनॉट प्लेस और गुरुग्राम तक, लोग अब खुले में बैठने के बजाय पौधों से घिरे नेचर-फ्रेंडली माहौल वाली जगहों को चुन रहे हैं।
 
मोना हाल ही में बर्लिन से दिल्ली घूमने आई हैं। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने पंचशील पार्क के आसपास कई कैफे खोजे, जहां बैठकर वो काम कर सकें। उनसे हमारी मुलाकात 'प्लांटरी' में हुई। यह तरह-तरह के पौधों से सजा एक कैफे है। मोना डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "मैं एक ऐसी जगह ढूंढ रही थी जहां वातावरण साफ हो। बाहर बहुत प्रदूषण है। मुझे मास्क पहनकर काम करने में दिक्कत हो रही थी। प्लांटरी में मुझे हवा साफ और ठंडी लग रही है। वरना बाहर का मौसम स्वास्थ्य के लिए बहुत खराब है। कुछ समय सांस लेने के बाद आपको सीने में भारीपन लगेगा।"
 
खाने के साथ-साथ साफ हवा और हरियाली देने की कोशिश 
प्लांटरी की शुरुआत इंटीरियर डिजाइनर फरियल सबरीना ने की। उनका बचपन बांग्लादेश के कोमिला और ढाका के हरित वातावरण में बीता। कोविड महामारी के दौरान फरियल ने मुंबई में रहते हुए अपने घर की बालकनी में गार्डनिंग शुरू की। उन्होंने मिट्टी, खाद और पौधों के बारे में सीखा। कई प्रयोग किए। जिसके बाद फरियल ने दिल्ली में हरियाली भरी एक जगह बनाने के बारे में सोचा।
 
फरियल डीडब्ल्यू से बातचीत में बताती हैं, "वर्ष 2022 में इस कैफे को खोला गया। यहां खाने के साथ ग्राहक पौधों को देखकर उनके बारे में जानना चाहते हैं। दिल्ली में लोग प्रकृति के करीब समय बिताने के लिए शहर छोड़कर जा रहे हैं। लेकिन हर किसी के लिए यह संभव नहीं होता। इसलिए लोग ऐसी जगहों की तलाश में रहते हैं, जहां वे आराम महसूस करें और मानसिक शांति पा सकें। प्लांटरी आने के लिए ऑफिस से छुट्टी भी नहीं लेनी पड़ती और दिल्ली से बाहर जाने का खर्च बचता है।"
 
प्लांटरी जैसे ग्रीन कैफे पर्यावरण के अनुकूल तरीकों को अपनाते हैं। दिल्ली में वायु प्रदूषण के कारण इन कैफे में भीड़ बढ़ रही है। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार नवंबर और दिसंबर में ग्राहकों की संख्या 40 प्रतिशत ज्यादा हुई है। उम्मीद है कि यह फरवरी तक और बढ़ जाएगी। 
 
एक अध्ययन से पता चलता है कि इस तरह के ग्रीन कैफे ग्राहक के अनुभव को बेहतर बनाते हैं। उनकी भावनात्मक और मनोस्थिति भी बेहतर होती है। ऐसे वातावरण में समय बिताने से तनाव कम होता है।
 
फरियल आगे कहती हैं, "कैफे में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी का मिश्रण पूरी तरह जैविक है। पौधों के गमले टेराकोटा और सिरेमिक से बने हैं। सब कुछ भारत में ही तैयार किया गया है। हम आयातित सामान से बचते हैं। इससे ट्रांसपोर्टेशन पर खर्च और कार्बन फुटप्रिंट कम होता है।"
 
प्लांटरी में रखा टेरीरियम सबको आकर्षित करता है। यह बोतल में बंद मिनी गार्डन की तरह दिखता है। कैफे को फेलिसिया, फिटोनिया, सैनसेविएरिया जैसे पौधों से सजाया गया है। ये पौधे छाया या कम रोशनी में भी बढ़ सकते हैं और हवा में मौजूद हानिकारक प्रदूषक तत्वों को सोखने में मदद करते हैं। लेकिन अत्यधिक प्रदूषण के कारण इन्हें दिन में कई बार पानी देना पड़ता है।
 
फरियल बताती हैं, "हवा में मौजूद पीएम कण पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए कैफे में पौधों की सफाई बेहद जरूरी है। बाहर रखे पौधों की पत्तियों पर धूल की परत जम जाती है, जिसे दिन में तीन बार धोना पड़ता है। अंदर भी डस्ट के कारण नियमित सफाई होती है।"
 
पौधों के बीच 'ग्रीन' फूड का भी आनंद ले रहे हैं ग्राहक
दिल्ली के वसंत विहार में एक ऐसा कैफे है, जो पौधों पर आधारित खाने के लिए जाना जाता है। ग्रीनर की शुरुआत वर्ष 2015 में हुई थी। अब लोग सोशल मीडिया के जरिए इसे खोजकर यहां पहुंच रहे हैं। कैफे में खाना मिलेट्स, लेग्यूम्स, ताजा सब्जियों और स्थानीय उत्पाद से बनाया जाता है। इस तरह कोशिश रहती है कि भोजन का पर्यावरण पर कम से कम प्रभाव पड़े और कार्बन फुटप्रिंट भी घटे।
 
ग्रीनर के पार्टनर वैभव नागोरी बताते हैं कि उनका मिशन हमेशा से एक जागरूक और पर्यावरण हितैषी व्यवसाय बनाना रहा है। ग्रीनर का मकसद जलवायु संकट को कम करने में छोटा लेकिन असरदार योगदान देना है। ग्रीनर लगातार नई पहल करता रहता है। ताकि न केवल कैफे का एक्यूआई अच्छा रहे, बल्कि बंद जगहों में कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर भी सामान्य बना रहे।
 
वैभव डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हमने दस साल पहले ग्रीनर की शुरुआत की थी। हम देख रहे हैं आज प्रदूषण की स्थिति और खराब हो गई है। ग्रीनर कैफे दिल्ली के प्रदूषण संकट के दौरान भी सुरक्षित जगह बनकर उभरा है। हाल ही में हमने यहां हनीवेल का खास एयर प्यूरीफिकेशन सिस्टम लगाया है। इसे निर्वाना एयर ने इंटीग्रेट किया है। यह टिकाऊ सिस्टम है और इसे आम हेपा फिल्टर की तरह बार-बार बदलने की जरूरत नहीं पड़ती।"
 
ग्रीन- कैफे जिसे बुलाते हैं अर्बन ओएसिस
गुरुग्राम में एक अन्य कैफे ‘गार्डन लवर्स' भी लोगों को लुभा रहा है। रोहित शर्मा ने अपनी पत्नी नीतू के साथ इसकी शुरुआत वर्ष 2021 में की थी। वे एक ग्रीन कम्युनिटी बनाना चाहते हैं। लोग उनके कैफे को 'अर्बन ओएसिस' के नाम से भी जानते हैं।
 
रोहित डीडब्ल्यू से बात करते हुए कहते हैं, "लोग यहां कुछ समय के लिए प्रकृति के बीच रहने आते हैं। हमारे ग्राहक इसे अर्बन ओएसिस बुलाते हैं, क्योंकि शहर के भीतर पौधों से घिरी जगह मिलना मुश्किल है। उनके लिए यह प्रदूषित शहर में बने एक छोटे से ओएसिस जैसा है। हमारे पास जेड और एरिका पाम जैसे करीब 120 ऐसे पौधे हैं। ये ऑक्सीजन देते हैं और हवा में मौजूद प्रदूषक सोख लेते हैं। जिन दिनों एक्यूआई ज्यादा होता है, उस दिन भीड़ भी ज्यादा होती है।"
 
हवा को कितना साफ कर पाते हैं ऐसे प्रयास  
एक्सपर्ट्स के मुताबिक पौधे लगाने से हवा की गुणवत्ता पर कुछ असर जरूर पड़ता है। लेकिन यह एयर प्यूरीफायर या फिल्टर जितना प्रभावी नहीं होता। नासा की एक रिपोर्ट के अनुसार, बंद कमरों में लगाए गए पौधे हवा में मौजूद हानिकारक प्रदूषकों को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। हालांकि कैफे, घरों और स्कूलों में, जहां हवा लगातार अंदर-बाहर होती रहती है, वहां पौधों का असर सीमित रहता है।
 
जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ। वी के राव डीडब्ल्यू को बताते हैं कि कई पौधों जैसे स्पाइडर प्लांट, पीस लिली, एरेका पाम और एलोवेरा में हवा से प्रदूषकों को सोखने की क्षमता होती है। लेकिन ये पौधे एयर प्यूरीफायर का विकल्प नहीं हैं और केवल पौधे लगाने से प्रदूषण कम नहीं हो सकता।
 
वह कहते हैं, "पौधे केवल उस सीमित जगह को सांस लेने के लिए थोड़ा बेहतर बना सकते हैं। पौधों के कई और फायदे हैं। ये मूड अपलिफ्ट करते हैं। जगह की सुंदरता बढ़ाते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ता है। मगर आज  प्रदूषण की स्थिति को ध्यान में रखते हुए पौधों के साथ प्यूरीफायर की भी आवश्यकता है। असली समाधान तो बाहर के प्रदूषण को कम करना ही है।"
 
रेस्तरां और कैफे कर रहे हैं बदलाव
कई कैफे और रेस्तरां भी अपने आप को इस बदलती प्राथमिकता के साथ ढाल रहे हैं। दिल्ली के मशहूर रूफटॉप कैफे खूबसूरत नजारों और लाइवली माहौल के लिए जाने जाते हैं। पर इस वर्ष उन्हें प्रदूषित हवा का सामना करना पड़ रहा है। कमला नगर, खान मार्केट, साउथ एक्सटेंशन, कनॉट प्लेस और मेहरौली में ऐसे कई कैफे और रेस्तरां हैं। पिछले वर्ष के मुकाबले यहां भीड़ कम होने लगी है। खुली जगह या आउटडोर रेस्तरां की बिक्री 25 प्रतिशत से अधिक घट गई है।
 
खान मार्केट ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष संजीव मेहरा डीडब्ल्यू को बताते हैं कि बाजारों में भीड़ बहुत कम है। इस हवा में परिवार छोटे बच्चों को लेकर बाहर नहीं निकलना चाहते। वह कहते हैं, "यह सीजन टाइम है। फिर भी नवंबर से बाजार और रेस्तरां खाली पड़े हैं। बिक्री में लगभग 25 से 30 प्रतिशत गिरावट आई है।"
 
ऐसे में कुछ कैफे अब अपना इंटीरियर और कांसेप्ट बदल रहे हैं। ग्रेटर कैलाश में स्थित ट्रबल (ट्रबल) के मैनेजर रवीश बताते हैं, "हम कोशिश कर रहे हैं कि लोग वापस लौटें। हमने इनडोर और आउटडोर दोनों जगहों पर एयर प्यूरीफायर लगवाए हैं। मिस्ट स्प्रे सिस्टम भी लगा है। हम सजावट के लिए अब और अधिक पौधों का इस्तेमाल करते हैं।”
 
ये भी पढ़ें
नई रोजगार गारंटी योजना नाम तो बदला, कितना बदलेगा जीवन?