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Written By DW
Last Modified: गुरुवार, 11 दिसंबर 2025 (14:03 IST)

ट्रंप की नई अमेरिकी सुरक्षा रणनीति में भारत की क्या जगह है?

अमेरिका की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में एशिया के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर नहीं दिया गया है। ट्रंप प्रशासन समझौते करने, सैन्य ताकत बढ़ाने और सहयोगी देशों से ज्यादा खर्च करवाने पर जोर दे रहा है।

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वेस्ली रान
डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने हाल ही में नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस) जारी की। इससे पूरे यूरोप में हलचल मच गई है और ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है।
 
एशिया के मामले में, यह रणनीति पहले की नीतियों से काफी मिलती-जुलती है। इसमें वही पुरानी बातें दोहराई गई हैं। जैसे, हिंद-प्रशांत क्षेत्र को "मुक्त और खुला" बनाए रखने की अहमियत पर जोर दिया गया है। चीन से निपटने और उसे नियंत्रित करने के लिए "साझेदार देशों के नेटवर्क" के साथ मिलकर काम करने की बात कही गई है।
 
साल 2025 कीराष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतिसे पता चलता है कि राष्ट्रपति ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका-चीन की आपसी प्रतिस्पर्धा को अलग नजरिए से देखा जा रहा है। अब एशिया के भविष्य के "सबसे बड़े दांव" को व्यापार सौदों, व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित बनाने, और "आर्थिक बढ़त बनाए रखने" पर केंद्रित बताया गया है।
 
भले ही अफरा-तफरी मचाने वाली ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी ने एशिया में अमेरिका के सहयोगी देशों को परेशान किया हो, लेकिन नए सुरक्षा दस्तावेज में कहा गया कि अमेरिका की अगुआई में आर्थिक स्थिरता ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को पीछे हटाने का सबसे मजबूत आधार है।
 
इसमें कहा गया है, "हम चीन के साथ अमेरिका के आर्थिक संबंध को फिर से संतुलित करेंगे। अमेरिकी आर्थिक स्वतंत्रता को बहाल करने के लिए आपसी लेन-देन और निष्पक्षता को प्राथमिकता देंगे। हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती की नींव रखना है।"
 
एपीईसी जैसे बड़े समूहों में शामिल होने की जगह भारत के लिए क्यों बेहतर हैं द्विपक्षीय समझौते
 
इस रणनीति में विस्तार से बताया गया है कि अमेरिका अपनी व्यापारिक, तकनीकी और सैन्य ताकत का इस्तेमाल कैसे करेगा, ताकि वह अपने सहयोगियों और विरोधियों दोनों को अमेरिकी हितों के अनुसार काम करने के लिए तैयार कर सके। यह दस्तावेज 'अमेरिका फर्स्ट' की भावना से भरा हुआ है।
 
भारत के बारे में क्या कहता है दस्तावेज?
ट्रंप दर्जनों बार खुद को भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम करवाने का श्रेय दो चुके हैं। एनएसएस दस्तावेज में भी यह दावा दोहराया गया है। इसके मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने "शांति के राष्ट्रपति" की अपनी विरासत को पुख्ता कर दिया है।
 
इस संदर्भ में ट्रंप की कथित उपलब्धियां गिनाते हुए बताया गया है, "डील करवाने की अपनी क्षमता का लाभ उठाते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के मात्र आठ महीनों के भीतर ही दुनियाभर के आठ संघर्षों में अभूतपूर्व शांति हासिल की। उन्होंने कंबोडिया और थाइलैंड, कोसोवो और सर्बिया, डीआर कोंगो और रवांडा, पाकिस्तान और भारत, इस्राएल और ईरान, मिस्र और इथियोपिया, आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच बातचीत के जरिए शांति करवाई।"
 
भारत, पाकिस्तान के साथ हुए संघर्षविराम में किसी तीसरे देश की भूमिका और प्रभाव से इनकार करता रहा है।
 
दस्तावेज में भारत का जिक्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक सहयोग के जरिए सुरक्षा बढ़ाने के संदर्भ में भी किया गया है। जरूरत बताई गई है कि अमेरिका को भारत के साथ रिश्ते सुधारने का काम जारी रखना चाहिए, जिससे भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा में योगदान के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इसी क्रम में क्वाड का भी जिक्र है। 
 
दक्षिण चीन सागर की चुनौतियों के संदर्भ में आशंका जताई गई है कि "कोई प्रतिद्वंद्वी साउथ चाइना सी को काबू" करने की कोशिश कर सकता है। इस स्थिति में दो प्रमुख आशंकाएं जताई गई हैं। पहली यह कि "एक संभावित विरोधी शक्ति" व्यापारिक रूप से दुनिया के सबसे अहम रास्तों में शामिल इस इलाके में "टोल सिस्टम" लगा दे। या फिर, अपनी मर्जी से रास्ते को बंद करने और खोलने की कोशिश करे।
 
इन दोनों संभावित स्थितियों को अमेरिकी अर्थव्यवस्था और हितों के लिए नुकसानदेह मानते हुए मजबूत उपाय की जरूरत रेखांकित की गई है। इस क्रम में भारत का भी जिक्र है, "इसके (मार्ग को खुला और टोल मुक्त रखने के लिए) लिए केवल हमारी सेना, खासतौर पर नौसेना में और ज्यादा निवेश की ही जरूरत नहीं होगी, बल्कि भारत से लेकर जापान और उन सभी देशों के साथ मजबूत सहयोग की भी जरूरत होगी, जिन्हें (व्यापारिक मार्ग को नियंत्रित किए जाने पर) नुकसान पहुंचेगा, अगर इस समस्या पर ध्यान ना दिया गया।"
 
लोकतंत्र की जरूरत किसे है?
ट्रंप की 2017 की पहली सुरक्षा रणनीति में "बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा" पर जोर दिया गया था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। पुरानी रणनीति में चेतावनी दी गई थी कि चीन और रूस दोनों "ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं, जो अमेरिकी मूल्यों और हितों के खिलाफ हो।"
 
नए दस्तावेज में वह बात भी नहीं है, जो लंबे समय से चीन को ऐसे दुश्मन के तौर पर दिखाती आ रही है जो एक अलग वैश्विक व्यवस्था को आगे बढ़ा रहा है।
 
इनकी जगह, यह नया दस्तावेज ट्रंप की प्रशंसा से भरा है। इसमें दावा किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने "अकेले दम" पर चीन के बारे में दशकों से चली आ रही "अमेरिकी गलतफहमियों" को बदल दिया है। खासकर, उस सोच में बदलाव किया है कि मुक्त व्यापार चीन को उदारवादी विचार अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।
 
इस दस्तावेज में दक्षिणपंथी बातों की भरमार है। इसमें यह कहते हुए आलोचना की गई है कि "हस्तक्षेप करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन" किसी देश की "संप्रभुता" को कमजोर कर रहे हैं। दस्तावेज के मुताबिक, "यह स्वाभाविक और न्यायसंगत है कि सभी देश अपने हितों को सबसे ऊपर रखें और अपनी संप्रभुता की रक्षा करें।"
 
अमेरिका अब अन्य देशों के साथ "शांतिपूर्ण और बेहतर व्यापारिक संबंध" बनाए रखने पर ध्यान देगा। साथ ही, उनपर "लोकतांत्रिक या किसी अन्य सामाजिक बदलाव थोपने" से बचेगा। दस्तावेज में आगे कहा गया है, "अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दुनिया में बड़े, धनी और ताकतवर देशों का प्रभाव हमेशा से ज्यादा रहा है और यह एक अटल सत्य है।"
 
यह नया दस्तावेज, 2017 के एनएसएस की तुलना में अलग है। पुरानी रणनीति में चीन पर सीधा आरोप लगाया गया था कि वह "दूसरे देशों की संप्रभुता को खतरे में डालकर अपनी ताकत बढ़ा रहा है।"
 
एमिली हार्डिंग, वॉशिंगटन में सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) में इंटेलिजेंस, नेशनल सिक्यॉरिटी और टेक्नोलॉजी प्रोग्राम की डायरेक्टर हैं। उन्होंने इस नए दस्तावेज के विश्लेषण में लिखा, "लोकतंत्र का एजेंडा साफ तौर पर खत्म हो गया है।"
 
वह कहती हैं, "बीजिंग इस बात से बहुत खुश होगा कि अमेरिका ने साफतौर पर घोषणा की है कि वह दूसरे देशों के मामलों में दखलअंदाजी नहीं करेगा और देशों की संप्रभुता का सम्मान करेगा।"
 
ताइवान को लेकर अमेरिका का पुराना रुख
चीन जब भी संप्रभुता की बात करता है, तो उसका इशारा अक्सर ताइवान की ओर होता है। ताइवान एक लोकतांत्रिक द्वीप है, जिसपर चीन अपना दावा करता है। चीन दृढ़ता से कहता रहा है कि जरूरत पड़ने पर वह सेना का इस्तेमाल करके भी ताइवान को मुख्य भूमि के साथ 'फिर से मिला' लेगा।
 
एनएसएस में ताइवान पर काफी ध्यान दिया गया है। नए अमेरिकी दस्तावेज में ताइवान को मुख्य रूप से 'चलती-फिरती सेमीकंडक्टर फैक्ट्री' और दक्षिण चीन सागर में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक जगह के तौर पर पेश किया गया है। फिर भी, ताइवान इस बात से खुश है कि अमेरिका दो क्षेत्रों (चीन और ताइवान) के बीच किसी संघर्ष को रोकने की बात कह रहा है।
 
दस्तावेज में कहा गया है, "ताइवान को लेकर होने वाले संघर्ष को टालना हमारी प्राथमिकता है। इसके लिए सबसे बेहतर तरीका है, सैन्य ताकत में अपनी बढ़त को बरकरार रखना। हम ताइवान पर अपनी पुरानी और घोषित नीति पर भी कायम रहेंगे। इसका मतलब है कि अमेरिका, ताइवान जलडमरूमध्य में कायम यथास्थिति में किसी भी एकतरफा बदलाव का समर्थन नहीं करता है।"
 
हालांकि, अमेरिका अधिकारिक तौर पर ताइवान को देश नहीं मानता, लेकिन इस द्वीप को सुरक्षा देने वाला सबसे बड़ा और मुख्य संरक्षक है।
 
विशेषज्ञों में इस बात को लेकर थोड़ी चिंता देखी गई है कि नई सुरक्षा रणनीति का रुख पहले की तुलना में थोड़ा नरम पड़ गया है। पहले जहां अमेरिका "एकतरफा बदलाव" का "विरोध" करने की बात कहता था। वहीं, अब वह सिर्फ "समर्थन नहीं करता" कह रहा है। हालांकि, यह उन अटकलों से काफी अलग है जिनमें चिंता जताई गई थी कि ट्रंप प्रशासन बीजिंग के सामने झुक जाएगा और ताइवान की आजादी का "विरोध" करेगा।
 
ताइवान के रक्षा मंत्री वेलिंगटन कू ने एनएसएस की तारीफ की। उन्होंने कहा कि "यह दस्तावेज हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों को साथ मिलकर एक मजबूत सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।"
 
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा, "अमेरिका को चाहिए कि वह ताइवान के मुद्दे को बेहद सावधानी से संभाले। साथ ही, उसे 'ताइवान की आजादी' चाहने वाले उन अलगाववादी समूहों को सहारा देना और समर्थन देना बंद करना चाहिए, जो जबरन आजादी चाहते हैं या बल का इस्तेमाल करके चीन के साथ मिलने का विरोध कर रहे हैं।"
 
पैसे दो और शामिल हो
ताइवान की स्थिति दक्षिण चीन सागर के जहाजी मार्गों के लिए इतनी महत्वपूर्ण है कि इसका "अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ता है।" इसलिए, एनएसएस में चेतावनी दी गई है कि एक "संभावित दुश्मन" उस जलमार्ग पर "टोल सिस्टम लगा सकता है" या अपनी मर्जी से उसे "जब चाहे बंद कर सकता है और फिर खोल सकता है।"
 
इसलिए इस रणनीति में, अमेरिका के एशियाई सहयोगियों से मांग की गई है कि वे "आगे बढ़कर सामूहिक सुरक्षा के लिए पैसा खर्च करें। सबसे जरूरी यह है कि सिर्फ खर्च ही नहीं, बल्कि रक्षा के क्षेत्र में बहुत ज्यादा योगदान दें।"
 
जापान और दक्षिण कोरिया का जिक्र संक्षेप में इसलिए किया गया है कि वे रक्षा खर्च और क्षमताएं बढ़ाएं, जिससे वे 'फर्स्ट आइलैंड चेन' की रक्षा कर सकें और दुश्मनों को पीछे हटा सकें। 'फर्स्ट आइलैंड चेन' एक रणनीतिक शब्द है, जिसका मतलब है कि जापान, ताइवान और फिलीपींस मिलकर एक ऐसा सुरक्षा घेरा बनाते हैं जो चीन की नौसेना को खुले प्रशांत महासागर में जाने से रोकता है।
 
वहीं, उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार और बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम से जापान और दक्षिण कोरिया को होने वाले खतरे को दस्तावेज में शामिल नहीं किया गया है।
 
इसके अलावा, अहम रणनीतिक सहयोगी के तौर पर फिलीपींस की भूमिका का भी जिक्र नहीं है। जबकि, यह देश अक्सर अपनी जमीन पर अमेरिका को अपनी सैन्य शक्ति (जैसे जहाज, विमान, मिसाइल आदि) को रखने या संचालित करने की इजाजत देता है। साथ ही, दोनों देश दशकों पुरानी रक्षा संधि से जुड़े हुए हैं।
 
विरोधाभासी रणनीति
एनएसएस में कई स्पष्ट विरोधाभासी बयान मौजूद हैं। इनमें एक यह भी है कि दस्तावेज में अमेरिका से मांग की गई है कि वह अपने "गठबंधन प्रणाली को एक आर्थिक समूह के रूप में मजबूत करे।" यह काम "निजी क्षेत्र की ओर से संचालित आर्थिक सहयोग" के जरिए किया जाए। जबकि, ट्रंप प्रशासन खुद बहुपक्षीय मंचों, जैसे एपीईसी को पसंद नहीं करता।
 
'इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप' में एशिया की डिप्टी डायरेक्टर हुआंग ले थू ने पिछले हफ्ते डीडब्ल्यू को बताया था कि दस्तावेज से यह साफ हो जाता है कि ट्रंप प्रशासन का मानना है कि "आर्थिक बढ़त बनाए रखना ही एशिया-प्रशांत क्षेत्र में संघर्षों को रोकने का तरीका है।"
 
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के ज्यादातर एशियाई सहयोगी इस दस्तावेज को लेकर 'मिली-जुली प्रतिक्रिया' दे रहे हैं। वजह यह है कि इसमें कोई बड़ा या चौंकाने वाला बदलाव नहीं था।
 
'काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस' के लिए लिखते हुए, चीनी मामलों के विशेषज्ञ डेविड सैक्स ने हिंद-प्रशांत रणनीति की आलोचना करते हुए इसे बहुत ज्यादा "चीन-केंद्रित" बताया। उन्होंने लिखा, "इस इलाके के दूसरे देशों को इसलिए महत्व दिया जाता है क्योंकि वे चीन के साथ आर्थिक मुकाबले में अमेरिका की मदद कर सकते हैं और बीजिंग के साथ संघर्ष को रोक सकते हैं।"
 
सैक्स के मुताबिक, "फिलीपींस के साथ अमेरिका की संधि है, लेकिन उसका जिक्र तक नहीं किया गया है। न ही प्रशांत क्षेत्र के द्वीपों या दक्षिण-पूर्व एशिया के ज्यादातर देशों का जिक्र है। अगर यह रणनीति वास्तव में अमेरिका की ताकतों का सही उपयोग करती, तो इसकी शुरुआत अमेरिका के सहयोगी देशों और साझेदारों से होती। साथ ही, चीन को एक बड़े हिंद-प्रशांत ढांचे के अंदर रखा जाता।"
 
ट्रंप का 'मोनरो सिद्धांत'
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को रोकने की अमेरिकी नीति से ज्यादा, बीजिंग के लिए चिंता का सबसे बड़ा कारण सुरक्षा दस्तावेज का मुख्य विषय होना चाहिए। वह विषय है, पश्चिमी गोलार्ध की ओर रणनीतिक ध्यान केंद्रित करना। इसके साथ ही "गोलार्ध के बाहर के प्रतिद्वंद्वियों" यानी चीन की गतिविधियों पर रोक लगाने का वादा करना।
 
दस्तावेज में इस बात पर जोर दिया गया है कि अमेरिका, लैटिन अमेरिका में गठबंधन बनाने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल करेगा। इसके लिए वह वहां अपने गठबंधन बनाएगा, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि "वहां के देशों में मौजूद बाहरी विरोधी ताकतों का प्रभाव कम किया जाए। जैसे, सैन्य ठिकानों, बंदरगाहों, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों पर नियंत्रण या रणनीतिक संपत्तियों की खरीद पर बाहरी देशों का प्रभाव।"
 
'अटलांटिक काउंसिल' में जियोस्ट्रेटजी इनिशिएटिव के नॉन-रेसिडेंट सीनियर फेलो अलेक्जेंडर बी। ग्रे लिखते हैं, "यह अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से चली आ रही प्रतिस्पर्धा को सामने लाता है। बीजिंग, पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका विरोधी गतिविधियों को आगे बढ़ाकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखने से अमेरिका का ध्यान भटकाना चाहता है।"
 
एनएसएस कानूनी रूप से बाध्यकारी कोई दस्तावेज नहीं है। इसका काम इस बात का संकेत देना है कि अमेरिका अपने देश के लोगों, अपने सहयोगियों और विरोधियों को क्या संदेश देना चाहता है। यह भविष्य की कार्रवाइयों की सीधी भविष्यवाणी नहीं है। फिर भी, यह दिखाता है कि अमेरिका की विदेश नीति अब लेन-देन वाली दिशा में आगे बढ़ रही है।
 
सीएसआईएस के हार्डिंग लिखते हैं कि ट्रंप को ऐसे ही वादों के आधार पर चुना गया था, लेकिन "आज अपने स्वार्थ के लिए गए फैसले भविष्य में देश को बहुत ज्यादा अलग-थलग, कमजोर और बिखरा हुआ बना सकते हैं।"
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