चिड़िया चली चांद के देश
दिशी सुराना (कक्षा-आठवीं)
चिड़िया ने देखा एक सपना, चांद के देश में घर है अपना।सभी जगह खुशहाली है, हरी-भरी हर डाली है। न कोई कलह न कोई द्वेश, चिड़िया पहुंची चांद के देश। सहसा उसकी आंख खुली तो खुद को उसने तन्हा पाया। धरती की गोद थी सूनी या सभी जगह सन्नाटा था छाया। रहा न सपना कुछ भी शेष, खो गया सुंदर चांद प्रवेश। चिड़िया मन में हुई हताश, धूमिल पड़ गई उसकी आस। पंख हैं कोमल, राह है लंबी, नापना होगा पूरा आकाश। उसने छोड़ी श्वास नि:शेष, कैसे जाऊं चांद के देश। आशाओं का भोर हुआ फिर, साहस आया कोमल तन में। हौंसलों के पंख लगाकर, उसने प्रण किया यह अपने मन में। हिम्मत से लिखूंगी अपनी कथा विशेष, जाऊंगी मैं चांद के देश। पूरी करने मन की अभिलाषाएं, अपने नन्हें पंख फैलाए। थामे आशाओं की डोर, चिड़िया चली क्षितिज की ओर। लेकर भारत का संदेश, चिड़िया चली चांद के देश।