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चटपटी कविता : मुन्नालाल‌

कविता
होत कबड्डी मुन्नालाल।
फट गई चड्डी मुन्नालाल।
पड़‌ गई टंगड़ी घुटने पर,
टूटी हड्डी मुन्नालाल।

दौड़ लगाई सौ मीटर।
दौड़े सभी सर्र सर सर।
दोस्त‌ भर रहे फर्राटे,
रहे फिसड्डी मुन्नालाल।

मित्रों के पाकिट खाली।
सभी सूरमा भोपाली।
रखे घूमते खींसे में,
सौ की गिड्डी मुन्नालाल।

तन तो उनका सुंदर है।
पर मन पूरा बंदर है।
गाल जरा तुचके पिचके,
निकली ठुड्डी मुन्नालाल।

धूम धाम से की शादी।
बहुत खुश हुई थी दादी।
साठ साल की मोटी-सी,
लाए बुड्ढी मुन्नालाल।
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512).... और पढ़ें