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चुलबुली कविता : बंदर इक कद्दू को लाया...

कृष्ण वल्लभ पौराणिक
बंदर इक कद्दू को लाया
उसे सड़क पर था दौड़ाया
अंदर से पोला था कद्दू
जोर-शोर से वह चिल्लाया ...1
'बंदर ने मुझको लुढ़काया
देख रहा है वह ललचाया
कब फूंटू वह खा ले मुझको
इसीलिए मुझको दुड़वाया' ...2 
 
सुनकर पालक दौड़ आया
उसने अपना ढेर लगाया
आरपार सड़क के ऊपर
जिससे कद्दू था रुक पाया ...3
 
'धन्यवाद है पालक भैया
तुमने मुझको खूब बचाया
बंदर देख रहा है गुमसुम
कर न पाया वह मन भाया'
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