हनुमान जी के बचपन की 5 घटनाएं

अनिरुद्ध जोशी| पुनः संशोधित मंगलवार, 7 जुलाई 2020 (14:36 IST)
हनुमानजी की माता का नाम अंजना है, जो अपने पूर्व जन्म में एक अप्सरा थीं। हनुमानजी के पिता का नाम केसरी है, जो वानर जाति के थे। माता-पिता के कारण हनुमानजी को आंजनेय और केसरीनंदन कहा जाता है। केसरीजी को कपिराज कहा जाता था, क्योंकि वे वानरों की कपि नाम की जाति से थे। केसरीजी कपि क्षेत्र के राजा थे। आओ जानते हैं हनुमानजी के बचपन की 5 घटनाएं।
1. हनुमानजी ने बचपन में पवनदेव और ऋषि मातंग से शिक्षा ग्रहण की थी। वह बचपन में ऋषियों के आश्रम के सारे फल खा जाते थे और ऋषियों को बहुत परेशान करते थे। हनुमानजी बचपन में बहुत ही नटखट और उद्धमी बालक थे। एक बार फलों के वन में इंद्र पुत्र जयंत, सूर्य पुत्र शनि आदि देवताओं के पुत्रों से भी उनका सामना हुआ था। तब उन्होंने प्रण लिया था कि मैं भी उड़ना सिखूंगा। फिर पवनदेव उन्हें उड़ना सिखाते हैं।
2. एक बार उन्होंने सूरज को फल समझकर निकलने का प्रयास किया। रास्ते में राहु ने उनका मार्ग रोका तो राहु को उन्होंने दूर फेंक दिया। फिर वे सूर्य को निगल जाते हैं तो संपूर्ण विश्व में अंधकार हो जाता है ये देखकर इंद्र व्रज फेंककर उनकी ठूड्डी पर प्रहार करते हैं तो उनकी ठूड्डी टूट जाती है और वे मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ते हैं जिसके चलते उनके पिता पवनदेव नाराजा होकर संपूर्ण विश्व से प्राणवायु को अपनी ओर खींच लेते हैं। इससे संसार के सभी जीव जंतु मरने लगते हैं। यह देखकर सभी देवता एकत्रित होकर उन्हें मनाते हैं और हनुमानजी को पुन: सचेत करने के बाद सभी देवता हनुमानजी को अपनी अपनी शक्तियां प्रदान करते हैं।
3. हनुमानजी बचपन में ही अपने महाबली बाली काका का मान मर्दन कर देते हैं। बाली को अपनी उड़ने की तेज शक्ति पर बहुत अभिमान था लेकिन हनुमाजी उसे भी तेज उड़कर उसका अहंकार तोड़ने का प्रयास करते हैं, लेकिन बाली का फिर भी अभिमान नहीं टूटता है तो वह उनसे गदा युद्ध करता है और हार जाता है तब वह हनुमानजी के पैर पकड़ लेता है।

4.एक बार बचपन में ही हनुमानजी समुद्र में से संजीवनी पर्वत को देवगुरु बृहस्पति के कहने से अपने पिता के लिए उठा लाते हैं। यह देखकर उनकी माता बहुत ही भावुक हो जाती है।

5. हनुमानजी ने एक बार शनिदेव के अभिमान को बचपन में ही तोड़ दिया था। बचपन में शनिदेव अपने माता पिता से रूठ कर घर से भाग जाते हैं और अपनी शक्ति के बल पर लोगों को परेशान करने लगते हैं। इस तरह शनिदेव एक गांव में इसलिए आग लगा देते हैं क्योंकि उस गांव के लोग उन्हें पानी नहीं पीने देते हैं। सभी गांव वाले शनिदेव को घेरकर मारने का प्रयास करते हैं तो हनुमानजी उन्हें बचा लेते हैं। लेकिन शनिदेव इस अहसान को नहीं मानते हैं। हनुमानजी से कहते हैं कि तुम्हें मेरे रास्ते में नहीं आना चाहिए था। हनुमानजी कहते हैं अब तुम सीधे अपने पिता के पास जाओ, लेकिन शनिदेव उनसे वाद विवाद करने लगते हैं। फिर दोनों में गदा युद्ध होता है तब हनुमानजी उन्हें अपनी पूंछ में लपेटकर उनके पिता के पास ले जाते हैं। इस तरह ऐसे कई मौके आए जबकि हनुमानजी की शनिदेव से टक्कर हुई और उन्हें शनिदेव को सबक सिखाया। अंत: में रावण की कैद से वे शनिदेव को छुड़ा लाते हैं तो फिर शनिदेव हनुमानजी के भक्त बनकर कहते हैं कि जो भी तुम्हारा भक्त होगा उस पर मेरी वक्र दृष्टि का असर नहीं होगा।



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