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जन्माष्टमी : गोविंदा आला रे, आला...

Written By WD
Updated: शुक्रवार, 4 सितम्बर 2015 (11:10 IST)
प्रीति सोनी 
गोविंदा आला रे अाला... जरा मटकी संभाल ब्रजबाला ... 
यह गाना तो आपने सुना ही होगा। खास तौर से जैसे-जैसे जन्माष्टमी का पर्व पास आता है, सोशल मीडिया से लेकर गली मोहल्लों में इस गाने के बोल सुनाई देने लगते हैं। हो भी क्यों ना... गोविंदा यानि माखनचोर, बंसी वाले कन्हैया के आगमन की तैयारियां जो जोरों पर होती है। और इन तैयारियों का उत्साह बगैर इस गाने कैसे पूरा हो भला । 

 
श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में जितना भी लीलाएं रची, वे मन मोह लेने वाली और आनंद से भर देने वाली थीं। फिर चाहे वह माखन चुराकर खाना हो, या फिर गोपियों के संग रास रचाना ..। उनकी नटखट लीलाओं ने उन्हे युवाओं का तो सबसे खास बनाकर रखा है। तभी तो बिल्कुल उनकी तरह मटकी फोड़ कर माखन खाने के लिए जन्माष्टमी पर युवाओं की टोलियां जमकर तैयारियां ही नहीं करती बल्कि अलग-अलग प्रतियोगिताएं भी आयोजित करती हैं।

भीड़ में घुसकर, उपर चढ़कर मटकी तक पहुंचना और वहां तक पहुंचकर भी कई बार खाली हाथ नीचे गिरना ... इस खेल में अलग ही रोमांच पैदा करता है। उसपर रंगों की बाल्टियां उड़ेलती गोपियां भी इस खेल में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती हैं। भगवान की लीलाएं भी अपरंपार ही हैं, द्वापर युग में खुद आनंद लिया, और कलियुग में अपन लीलाओं के नाटकीय रूप से ही सही, लेकिन लोगों को भरपूर आनंद कराया। 
 
यह तो रही बड़े शहरों के गली मोहल्लों की बात। छोटे बच्चों के लिए भी यह त्यौहार उतना ही रोमांचक और मजेदार होता है। भई उन्हें कृष्ण बनकर इठलाने का मौका जो मिल जाता है। नन्हे-नन्हे कृष्ण कन्हैया, जब बांसुरी लेकर, मोर मुकुट पहने निकलते हैं, तो हर कोई उनकी इस छवि पर मोहित हुए बिना नहीं रह पाता। स्कूलों में मटकी फोड़ प्रतियोगिताएं, माखनचोर की लालाओं का बखान कर, खेल-खेल में ही बच्चों को कृष्णावतार की शिक्षा भी दे जाती है। यही नहीं छोटी-छोटी पायल छनकाती राधा और गोपियां यहां आकर्षण का प्रमुख केंद्र होती है। राधा कृष्ण के बाल रूप में मासूम सी सूरतें और सौंदर्य की छवि, कल्पना करने पर मजबूर करती है, कि जब कृष्ण थे तो क्या वे भी ऐसे ही थे।
 
युवाओं और बच्चों के अलावा जन्माष्टमी का पर्व घर-घर में व्रत-उपवास कर मनाया जाता है। रात 12 बजे कृष्ण जन्म, आरती और झूला झुलाने की परंपरा का निर्वहन कर, माखन मिश्री और पंजरी का प्रसाद बांट कर हर घर में कृष्ण के आगमन का उत्सव होता है। प्रतीकात्मक रूप में ही सही, वर्ष में एक दिन उसी तिथि‍ पर कन्हैया हमें उन के होने का एहसास जरूर करा देते हैं।  
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