'जैविक घड़ी' का रहस्य जानकर चौंक जाएंगे आप

Last Updated: शनिवार, 4 जून 2016 (18:42 IST)
'जैविक घड़ी' का वैज्ञानिक सत्य : धरती के सारे जीवधारियों के शरीर की आंतरिक 'जैविक घड़ी' बिलकुल एक ही पैटर्न पर काम करती है। 24 घंटे काम करने वाली इस घड़ी के मैकेनिज्म के बारे में धरती पर मिल रहे प्राचीनकाल के शैवालों से इस बारे में जानकारी मिली है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के भारतीय मूल के युवा वैज्ञानिक अभिषेक रेड्डी ने पता लगाया कि किसी भी जीवधारी की कोशिकाओं को 24 घंटे संचालित करने वाली घड़ी का मैकेनिज्म एक-सा रहता है।
 
उन्होंने पता लगाया कि पृथ्वी पर करोड़ों सालों से जीवधारियों की 'जैविक घड़ी' का पैटर्न एक ही तरह का पाया गया है। जिन लोगों की नियमित दिनचर्या नहीं होती, उनकी 'जैविक घड़ी' का मैकेनिज्म बिगड़ जाता है। इस रिसर्च से मालूम हुआ है कि मनुष्यों की दिनचर्या हजारों सालों से एक जैसी है और उसका कारण उसके भीतर संचालित हो रही 'जैविक घड़ी' है।
 
शोधानुसार मनुष्य में 'जैविक घड़ी' का मूल स्थान उसका मस्तिष्क है। मस्तिष्क हमें जगाता और मस्तिष्क ही हमें सुलाता है। औसतन हम 1 मिनट में 15 से 18 बार सांस लेते हैं तथा हमारा हृदय 72 बार धड़कता है। यदि यह औसत गड़बड़ाता है तो शरीर रोगी होने लगता है। इसी के आधार पर व्यक्ति के सोचने-समझने की दशा-दिशा, तर्क-वितर्क, निर्णय-क्षमता एवं व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म में ध्यान और प्रार्थना को सबसे उत्तम माना गया है।
 
वैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य के शरीर में अनुमानित 60 हजार अरब से 1 लाख अरब जितने कोश होते हैं और हर सेकंड 1 अरब रासायनिक संक्रियाएं होती हैं। उनका नियंत्रण सुनियोजित ढंग से किया जाता है और उचित समय पर हर कार्य का संपादन किया जाता है। सचेतन मन द्वारा शरीर के सभी संस्थानों को नियत समय पर क्रियाशील करने के आदेश मस्तिष्क की पिनियल ग्रंथि द्वारा स्रावों (हार्मोन्स) के माध्यम से दिए जाते हैं। उनमें मेलाटोनिन और सेरोटोनिन मुख्य हैं जिनका स्राव दिन-रात के कालचक्र के आधार पर होता है।
 
यदि किसी वजह से इस प्राकृतिक शारीरिक कालचक्र या 'जैविक घड़ी' में विक्षेप होता है तो उसके कारण भयंकर रोग होते हैं। इस चक्र के विक्षेप से सिरदर्द व सर्दी से लेकर कैंसर जैसे रोग भी हो सकते हैं। अवसाद, अनिद्रा जैसे मानसिक रोग तथा मूत्र-संस्थान के रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, हृदयरोग जैसे शारीरिक रोग भी हो सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार उचित भोजनकाल में पर्याप्त भोजन करने वालों की अपेक्षा अनुचित समय कम भोजन करने वाले अधिक मोटे होते जाते हैं और इनमें मधुमेह की आशंका बढ़ जाती है। 'जैविक घड़ी' के गड़बड़ाने से व्यक्ति के भीतर की प्रतिरोधक क्षमता में कमी आने लगती है।
 
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