डिजिटल मीडिया और हिंदी की संभावनाओं और चुनौतियों पर हुईं बातें

वह दिन दूर नही है जब क्लासेस नहीं होंगी बल्कि डिजिटल तरीके से होगी पढ़ाई- कुलपति नरेंद्र धाकड़

Last Updated: गुरुवार, 28 मार्च 2019 (19:20 IST)
इंदौर। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय अंतर्गत पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 28 मार्च से आरंभ हुई। इस संगोष्ठी का विषय है डिजिटल मीडिया और हिंदी : सम्भावनाएं और चुनौतियाँ। संगोष्ठी का शुभारंभ देवी अहिल्या विश्व विद्यालय के कुलपति डॉ. नरेन्द्र धाकड़ ने किया।

इस मौके पर डॉ. धाकड़ ने कहा कि पत्रकारों में संस्कार होना जरूरी है। जिसकी आज कमी है। संस्कार के बिना कोई भी पत्रकार सफल नहीं हो सकता है। साथ ही खबरों को सही तरीके से लिखने पर भी उन्होंने जोर दिया। उन्होंने कहा कि मीडिया में भी जो अच्छी और सही जानकारी आना चाहिए वह नहीं आती है बल्कि मिर्च मसाले वाले समाचार प्रमुखता के साथ छप जाते हैं।

पुराने पत्रकारों के पास डिग्री नहीं लेकिन जानकारी भरपूर
गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष एवं डिजिटल डाटा के महारथी उमेश आर्य ने कहा कि पुराने पत्रकारों के पास पत्रकारिता की डिग्री नहीं होती थी, लेकिन जानकारी पूरी होती थी। आज पत्रकारों के पास पत्रकारिता की डिग्री तो है, लेकिन जानकारी नहीं होती है। यू-ट्यूब के कारण अब जानकारी हमारे पास ओवरलोड है, लेकिन हमें यह नहीं मालूम है कि इसमें से हमारी उपयोग की जानकारी कौन सी है और उसे हमें किस तरह से प्राप्त करना है।

50 लाख लोगों तक पहुंचने में लगे 2 साल
नईदुनिया डॉट कॉम के संपादक सुधीर गोरे ने कहा कि वर्ष 2016 से 18 के दौर में एंड्रॉयड एप्लीकेशन ने हम सभी को इंफॉर्मेशन के हाईवे पर लाकर खड़ा कर दिया है। रेडियो को 50 लाख लोगों तक पहुंचने में 8 वर्ष का समय लगा था। जबकि डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू को 50 लाख लोगों तक पहुंचने में केवल 2 साल का समय लगा। आज हमारे देश में 80% रीडर मोबाइल पर उपलब्ध हैं। पत्रकारिता के लिए कंटेंट सोर्स रेलीवेंसी और क्वालिटी की जरूरत है।

हिंदी पोर्टल्स का उज्जवल है भविष्य
हिंदी पोर्टल वेबदुनिया के एडिटर-एंटरटेनमेंट ने कहा कि भारत में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के पोर्टल्स का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। हिंदी पढ़ने वालों की दर प्रतिवर्ष 94 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है जबकि अंग्रेजी में यह दर 19 प्रतिशत है। यही कारण है कि तेजी से नए पोर्टल्स सामने आ रहे हैं। अब पोर्टल के काम में कई बड़े खिलाड़ी आ गए हैं। इनके आने का भी कारण यही है कि आने वाला समय हिंदी पोर्टल का समय है। पोर्टल पर जो भी लिखा जाए वह सोच समझ कर लिखना चाहिए क्योंकि अखबार में तो जो छपा है वह एक ही दिन दिखता है, लेकिन पोर्टल में कई सालों के बाद भी लिखी गई खबर स्क्रीन पर आ जाती है और प्रासंगिक बन जाती है।


डिजीटल मीडिया का है समय
इस मौके पर इस संगोष्ठी की आयोजक अध्ययन शाला की विभागाध्यक्ष डॉक्टर सोनाली नरगुंदे ने कहा कि यह पहला मौका है जब इस अध्ययन शाला में इस तरह की संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। वर्तमान समय डिजिटल मीडिया का समय है। ऐसे में हम इस संगोष्ठी के माध्यम से यह समझना चाहेंगे कि डिजिटल मीडिया में हिंदी का स्थान क्या है और आगे उसके लिए संभावनाएं कितनी है।

शोध पत्र के हुए वाचन
तकनीकी सत्र के प्रथम भाग में 17 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र का वाचन किया। शोध पत्र के विषय डिजिटल मीडिया व हिंदी: चुनौतिया एवं संभावनाओं से संबंधित थे। संचार माध्यम, हिंदी भाषा और स्वतंत्रता, शाब्दिक त्रुटियां, सोशल मीडिया में हिंदी की उपयोगिता, हिंदी में विश्लेषण, पत्रकारिता और प्रभाष जोशी जैसे कई विषयों पर शोधार्थियों ने अपने शोध प्रस्तुत किए और कहा कि खैरियत पूछने का जमाना गया साहब आदमी ऑनलाइन दिख जाए तो सब ठीक है। उदघाटन सत्र का संचालन आभा निवसरकर ने किया और आभार डॉ. कामना लाड़ ने माना।

रिसर्च एक गंभीर विषय
वहीं विषय विशेषज्ञों द्वारा विश्लेषण करते हुए नागपुर विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष धर्मेश धामणकर ने बताया कि रिसर्च एक बहुत सीरियस विषय है। रिसर्च का ऑब्जेक्ट, की-वर्ड, मेथोडोलॉजि होती है लेकिन इसका अभाव दिखता है। उमेश आर्य ने कहा की 100 खबरों के आधार पर भी शोध हो सकता है लेकिन अगर हम ज्यादा से ज्यादा खबरों के आधार पर शोध करेंगे तो उसका प्रभाव दिखेगा। शोध में फैक्ट्स और फिगर पर काम करना आवश्यक है।

महारानी लक्ष्मीबाई स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष संध्या गंगराड़े ने बताया कि शोध की सामग्री विषय के अनुरूप होना चाहिए। विषय का भटकाव बताता है कि शोध पूरे मन और लगन से नहीं की गई। प्रथम तकनीकी सत्र का संचालन दिव्या हुरकत ने किया।

तकनीकी सत्र के द्वितीय भाग में तीन शोधार्थियों द्वारा अपने शोध पत्र का वाचन किया। शोधार्थियों ने बताया कि डिजिटल मीडिया की वजह से डॉक्यूमेंट्री का व्यू बड़ा है और डिजिटल मीडिया की वैल्यू के बारे में चर्चा हुई। विषय विशेषज्ञ के रूप में संजीव गुप्ता( माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल) कला जोशी(अटल बिहारी वाजपेयी शासकीय महाविद्यालय, इंदौर) एवं जयति मिश्रा(एमिटी यूनिवर्सिटी, जयपुर) मौजूद रहे।



युवा लगाएंगे हिंदी की नौका पार
अतिथियों द्वारा विषय पर अपना विश्लेषण बताते हुए संजीव गुप्ता ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी एक बारात जैसी होती है जिसमें दूल्हे से लेकर बाराती तक सब सज-संवर कर आते हैं इसलिए सभी शोधार्थियों ने अति विशिष्ट शोध प्रस्तुत किया है। कला जोशी ने अपना विश्लेषण बताते हुए कहा कि यहां आकर अनुभव हुआ कि शोध की सार्थकता क्या होती है। विश्व मंच पर हिंदी की ताकत बढ़ रही है और उसका कारण कहीं ना कहीं देश का युवा है। मीडिया और डिजिटल मीडिया की नाव पर सवार होकर यह युवा ही हिंदी की नौका को पार लगाएगा। इस मौके पर 'गर्भनाल' पत्रिका का भी विमोचन हुआ।

दूसरे दिन का आकर्षण
संगोष्ठी की समन्वयक एवम पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला की विभागाध्यक्ष डॉ. सोनाली नरगुंदे ने बताया की 29 मार्च सुबह 10:20 बजे से तृतीय तकनीकी सत्र रहेगा। इसमें मार्क लिंडले (वरिष्ठप्राध्यापक, इंग्लैंड), श्री जोसुआ (शोधार्थी,न्यू मीडिया, केन्या), प्रा. श्रीकांत सिंह (विभागाध्यक्ष, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल), रेखा सेलके(प्राचार्य, एमजीएम पत्रकारिता एवं जनसंचार महाविद्यालय, औरंगाबाद) व डॉ. राघवेंद्र मिश्रा (सह-प्राध्यापक, जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक) रहेंगे।

चतुर्थ तकनीकी सत्र में प्रा. सुंदर राजदीप ( विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता विभाग, मुम्बई विश्वविद्यालय, मुम्बई), डॉ. मीनू कुमार (संकाय सदस्य, पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला, दे.अ. वि. वि. इंदौर) व श्री मनोज कुमार (संपादक, समागम पत्रिका,इंदौर) रहेंगे। वही समापन सत्र में विशिष्ट अतिथि श्री पी.नरहरि (आयुक्त,जनसंपर्क विभाग,मध्यप्रदेश) व मुख्य अतिथि डॉ. उर्मिला पोरवाल (विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग,शेषाद्रिपुरम कालेज, बेंगलोर) व एम.एल.गुप्ता (संचार प्रबंधन एवं तकनीकी विभाग, गुरुजम्भेश्वर विज्ञान एवं तकनीकी विश्वविद्यालय, हिसार) रहेंगे।

 

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