dipawali
✕

क्या हम आजादी का जश्न मनाने के अधिकारी हैं जब सड़क, बिजली, पानी को मोहताज है जनता...

Updated: मंगलवार, 14 अगस्त 2018 (12:26 IST)
-धीरेन्द्र गर्ग
 
हम लोकतंत्र में रहते हैं और अगर लोकतंत्र में सभी को बराबर भागीदारी और साथ न मिले तो सच्चा जनतंत्र नहीं कहा जा सकता है। आने वाले 15 अगस्त को भारतीय स्वतंत्रता के अध्याय में एक और साल जुड़ जाएगा। इसी दिन हमने अत्याचारी ब्रितानी हुकूमत के बाद आजादी का पहला सूरज देखा था। 
 
आजाद होने के बाद यह सोचा गया था कि हिन्दुस्तान एक धर्मनिरपेक्ष देश होगा। इसमें सांप्रदायिकता अतीत की चीज होगी। लेकिन यह दुर्भाग्य रहा कि ऐसा हकीकत में हो नहीं पाया। अब तक देश ने कई प्रधानमंत्री व सरकारें देखीं।
 
देश में प्रगति भी हुई, परंतु आज जब मैं इस अजीम देश के 71 वर्षों का इतिहास देखता हूं तो मेरे जेहन में कुछ खलिश होने के साथ कुछ सवाल भी कौंधते हैं जिसका जवाब कहीं भी नहीं मिलता दिख रहा है।
 
यहां एक प्रश्न इन नीति-नियंताओं से है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने सालों बाद भी देश का एक बड़ा हिस्सा गरीब क्यों है? क्या इसके लिए वे लोग जिम्मेदार हैं जिन्होंने प्रतिनिधि चुनकर एक समृद्धशाली देश का स्वप्न देखा!
 
एक रिपोर्ट के अनुसार आबादी के मात्र 18 प्रतिशत हिस्से के पास ही 21वीं सदी की मूलभूत सुविधाएं जैसे स्वच्छ पानी, सफाई तथा भोजन है जबकि अनेक योजनाएं सरकार जनहित में चला रही हैं! आज देश का एक बड़ा तबका शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली तथा पानी जैसी सुविधाओं से महरुम क्यों है? क्या यह उन मरहूम महान सेनानियों का अपमान नहीं है? जिन्होंने हमें आजाद कराने के लिए अपनी बलि दे दी।
 
मैं विकास का झुनझुना थमाने वाले राजनीति के खिलाड़ियों से जानना चाहता हूं कि आज भी देश की लगभग 33 करोड़ की आबादी गरीब क्यों है? जबकि कुबेरपतियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।
 
इस तथाकथित कृषि-प्रधान देश में आज अन्नदाताओं की हालत इस कदर खराब है कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। एनसीआरबी की मानें तो अब तक देश के 2 लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली है और 41 फीसदी किसान खेती छोड़ना चाहते हैं। ऐसे में हमारे सामने खाद्य सुरक्षा की जबरदस्त चुनौती होगी।
 
महंगाई ने सबका गला दबा रखा है, दिनोदिन आतंकवाद देश में जड़ें जमा रहा है फिर भी आजादी का जश्न! इन सब का जिम्मेदार कौन है? क्या इन सबके बाद भी हम महान हैं? ऐसे में हालत में शायद सोचनीय है।
 
यदि सिलसिला ऐसा ही रहा तो नीति-निर्माताओं से जनता का इकबाल भी उठ जाएगा। सिर्फ विश्वगुरु बनने का अलाप भरकर भारत को विश्व का अगुआ नहीं बनाया जा सकता। उसके लिए सरकारों को योजनाओं की रस्म-अदायगी से ऊपर उठकर देश की आवश्यक आवश्यकताओं और समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
 

Show comments

पटना में खरगे के बयान पर सियासी घमासान, भाजपा नेताओं ने भी किया पलटवार, क्‍या बोले राजनाथ और अमित शाह?

फ्रांस में सड़कों पर उतरे लाखों लोग, पेरिस में आंसू गैस, क्यों भड़का जनता का गुस्सा?

India-China Face Off : ITBP Chief Statement पर केंद्र सरकार का जवाब, जानिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर अभी क्या हैं हालात?

दिल्ली में प्रदर्शनों और सुरक्षा को लेकर अलर्ट, अमित शाह ने पुलिस अधिकारियों के साथ 3 घंटे की बैठक में क्या-क्या किया रिव्यू?

पटना में मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम में मचा हंगामा, PM मोदी के जिक्र पर युवक की क्‍यों हुइ पिटाई?

सभी देखें

योगी सरकार के विजन से वैश्विक औद्योगिक पावर हाउस बनेगी 'पीतल नगरी' मुरादाबाद, 'यूपी डायलॉग्स' में हुआ मंथन

पटना में खरगे के बयान पर सियासी घमासान, भाजपा नेताओं ने भी किया पलटवार, क्‍या बोले राजनाथ और अमित शाह?

दीपोत्सव से अयोध्या के कुम्हार परिवारों को मिला रोजगार, योगी सरकार के प्रयासों से बढ़ी मिट्टी के दीयों की मांग

योगी सरकार के विकास मॉडल से आजमगढ़ को नई पहचान, ‘यूपी डायलॉग’ में शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता पर गहन मंथन

PM मोदी पर खरगे के बयान की CM मोहन यादव ने की कड़ी निंदा, बोले- कांग्रेस का आचरण देश के सामने है, राजनीति में मर्यादा जरूरी

अगला लेख