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अब्बास किरोस्तामी : मुझको मेरे बाद ज़माना देखेगा

Updated: शुक्रवार, 26 मई 2017 (15:28 IST)
कान फिल्म फेस्टिवल से प्रज्ञा मिश्रा

कान फिल्म फेस्टिवल अब इस साल का विजेता कौन ? इस दौर में पहुंच गया है। लेकिन आज हम बात कर रहे हैं अब्बास किरोस्तामी की फिल्म '24 फ्रेम्स'। यह फिल्म फेस्टिवल के 70 साल पूरे होने के समारोह की तरह से दिखाई जा रही है। फिल्म इसलिए बहुत ज्यादा ख़ास है कि अब्बास पिछले साल जुलाई में नहीं रहे और यह उनकी आखिरी फिल्म है। 
 
'मुझको मेरे बाद ज़माना देखेगा' वाली सिचुएशन है। अब्बास ने अपनी पिछली फिल्मों से इस फिल्म को एक बहुत ही अलग फॉर्मेट में बनाया है। इस फिल्म में कैमरे की एक फ्रेम है। और ऐसी 24 फ्रेम हैं, शुरुआत होती है, एक पेंटिंग से जिस में धीरे से धुंआ आ जाता है, फिर कौवे बोलना शुरू करते हैं , कुत्ता भौंकता है। हर फ्रेम कुछ मिनटों की ही है, इस बिना आवाज वाली फिल्म, बिना डायलाग वाली की पहली फ्रेम से एक उत्सुकता जागती है कि आखिर डायरेक्टर क्या दिखाना चाह रहा है। हर फ्रेम में जानवर, पक्षी, समुद्र की लहरें, तेज़ हवा, इनकी ही आवाज़ें हैं। लेकिन कोई बात नहीं है। 
 
एक फ्रेम में बर्फ गिर रही है और हिरन घास खा रहा है, उसके आसपास पक्षियों की, जंगल की आवाज़ें मौजूद हैं लेकिन वह बेफिक्र है। और फिर बन्दूक की आवाज़ आती है। वह भागना चाहता है तभी दूसरी गोली चलती है और वह गिर जाता है। ऐसी ही हर फ्रेम एक हमेशा की याद बन के दिमाग में बस जाती है। इस फिल्म को यादों का एल्बम या ऐसी किताब कहा जा सकता है जिसको खोलते ही एक तस्वीर नहीं एक कहानी नज़र आती है।  
 
एक खामोश फ्रेम से भी कितना कुछ कहा जा सकता है, यह अब्बास किरोस्तामी ने कर दिखाया है। एक तरफ जहां सीन में, फ्रेम में जितना ज्यादा दिखाया जा सके यह कोशिश होती है, इस फिल्म में एक फ्रेम में कितनी कहानी कही जा सकती है यह साबित किया है। मणि कौल और ऋत्विक घटक का सिनेमा याद आ जाता है। 
 
इस फिल्म से डायरेक्टर की महानता साबित होती है क्योंकि भले ही यहां कोई कहानी नहीं कही गई लेकिन इन दो घंटों में ऐसी इमेज ऐसी तस्वीरें दिल दिमाग पर असर कर गई हैं जो भुलाना नामुमकिन है। 

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लेखक के बारे में
प्रज्ञा मिश्रा
प्रज्ञा मिश्रा, स्वतंत्र लेखिका हैं। लंदन में निवास करती हैं, चिकित्सा व्यवसाय से जुडीं हैं।.... और पढ़ें
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