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भगोरिया

जीवन के अभावों पर आनंद का छींटा

Written By ND
Updated: बुधवार, 9 जुलाई 2014 (19:50 IST)
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हवाओं में जब गर्मी अपने तेवर दिखाने लगे, खुशबू का अहसास उसमें तैरने लगे, मादकता गीतों में जगह बनाने लगे, पत्थर तोड़ते हाथों के पोरों पर मेहँदी की उपस्थिति दर्ज होने लगे, ताड़ी महुआ में रस भरने लगे, टेसू खिलने लगे, वसंत यौवन पर आने लगे तो समझो भगोरिया आने वाला है। भीली संस्कृति का अपना त्योहार।

ऐसा पुरातन त्योहार जो हर दौर की नवीनता को अपनी तहजीब देता है। अपने अंदर का संदेश व ऊर्जा देता है। भगोरिया केवल मानव नहीं, प्रकृति भी अपने संकेतों के साथ मनाती है। यह त्योहार उन्हीं लोगों के लिए है जो हड्डियों की मजबूती की परीक्षा प्रत्येक दिन श्रम करके लेते हैं। जिनके हृदय में कोमलता की एक धारा तो बहती है, लेकिन उस पर कठोर जीवनशैली का कवच भी होता है।

इसे नारियल को प्रतीक बनाकर नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि नारियल की अंदरूनी धारा व ऊपर की कठोरता के बीच स्वाद की मोटी परत मौजूदगी रहती है। इसे भूमिगत जल की एक पतली धारा के माध्यम से समझा जाना चाहिए। इस पतली-सी गुमनाम अदृश्य धारा के ऊपर सैकड़ों फुट मोटी कोरी मिट्टी व ठोस चट्टानों का पहाड़ मौजूद रहता है। भगोरिया इस पतली-सी, कोमल धारा को धरती फोड़कर छूता है।
  हवाओं में जब गर्मी अपने तेवर दिखाने लगे, खुशबू का अहसास तैरने लगे, मादकता गीतों में जगह बनाने लगे, पत्थर तोड़ते हाथों के पोरों पर मेहँदी की उपस्थिति दर्ज होने लगे, ताड़ी महुआ में रस भरने लगे, टेसू खिलने लगे, वसंत यौवन पर आने लगे तो समझो भगोरिया आ गया।      


इसमें पाने की जो खुशी होती है वह किसी मुराद, किसी दैविक प्रसाद से कम नहीं होती। भगोरिया में मिला प्रेम ठीक वैसा ही होता है जैसे भूमिगत जल को गंगा मैया का प्रसाद मानकर लोग घर-आँगन में विराजित कर लेते हैं। भगोरिया ढीढता का प्रतीक नहीं, बल्कि इसका प्रसाद या तो मन्नत करके पाया जाता है या पुरुषार्थ का परिचय देकर प्राप्त किया जाता है। हजारों लोगों की उन्माद जगाती भीड़ में अपनी चाहत पर हाथ रख देना स्वयं पर व अपनी चाहत के समर्पण पर, अपने पुरुषार्थ पर विश्वास की पराकाष्ठा के बिना संभव नहीं होता।

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भगोरिया केवल एक अवसर भर नहीं होता है लूट-खसोट कर लेने का, एक जीवन की शुरुआत होता है, जिसका आधार प्रेम की वह बूँद होती है जो सदियों से बहा करती है। सुविधाओं की चाहत के बिना पूरी जिंदगी अभावों के हाथों सहर्ष सौंप देना। उफ्‌-आह-त्रास को नकारकर उस आनंद के एक क्षण में पूरा जीवन समेट देना भगोरिया है।

इतनी जीवंतता होती है भगोरिया में कि सूरज ने कब अपना सफर पूरा कर लिया, पता ही नहीं चलता। लोकगीत ऐसे कि शब्द रचना समझ में न आए, तब भी कान उनसे जुड़े रहें। चेहरों के भाव ऐसे कि कैमरे को राहत का अवसर ही न मिले। श्रंगार ऐसा कि उसमें प्राकृतिक सौंदर्य की विशेषता खोजने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़े।

सबके सामने वह कोई आता है कि निगाहों में चमक जाग उठती है। निगाहों की यह चमक बेशरम नहीं होती। लेकिन इसमें इतना साहस होता है कि वह दुनिया की अर्थपूर्ण दृष्टि का मुकाबला करती रहे। एक सप्ताह के इस आयोजन में पूरी जिंदगी की शर्तें, रिश्ते समेट लिए जाते हैं। हर रोज होने वाले भगोरिए में पूरे सप्ताह फिर उसी का इंतजार किया जाता रहता है।

दिन उसे देखने में तो रातें नाचने-गाने में गुजर जाती हैं। होली की मस्ती से ठीक एक सप्ताह पहले शुरू होने वाला, भीली संस्कृति को एक पहचान देने वाला भगोरिया दो भागों में बँटा होता है। एक भगोरिया मेला तो दूसरा भगोरिया त्योहार। एक का मूल स्वर अगर प्रेम पाने का प्रयास है तो दूसरे का स्वर आध्यात्मिकता में रच जाने का है। दोनों शुरू साथ-साथ होते हैं।

त्योहार तो उसी माह समाप्त हो जाते हैं लेकिन इन मेलों को जिसने आत्मसात कर लिया, वह फिर जन्म-जन्म तक उनसे बँधा रह जाता है। भगोरिया त्योहार प्रायः प्रौढ़ पुरुषों के नायकत्व का हिस्सा है। इसमें स्त्री की प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं होती। वहीं भगोरिया मेला बिना नायिका के पूरा नहीं होता। एक अगर वैराग्य का स्वांग है तो दूसरा प्यार की अधीरता को अर्पित है। भगोरिए को त्योहार के रूप में मनाने वाले इन दिनों में अपने बदन को हल्दी से लेप कर रखते हैं। बदन का ऊपरी हिस्सा खुला रहता है। सिर पर साफा बाँधा जाता है।

हाथ में नारियल व काँच रहता है। भोजन एक समय करते हैं, वह भी हाथ से बनाकर। जीवन संगिनी से दूर रहकर कुछ आवश्यक साधना पूरी करते हैं। होली के बाद ये लोग गल देवता की विधि-विधान से पूजा करते हैं, मन्नत उतारते हैं। इस समय गाँव के विशिष्ट लोग उपस्थित रहते हैं। गल देवता के मेले जुटते हैं।

मन्नतधारी व्यक्ति को गल देवता के ऊपर चढ़ाकर उसे हवा में गोल-गोल घुमाया जाता है। मन्नतें भी बड़ी विचित्र होती हैं, जैसे पानी अच्छा गिरे, फसलें अच्छी हों, परिवार के बीमार लोग ठीक हो जाएँ, कर्जा समाप्त हो जाए आदि। इस दरमियान शराब व मांस दोनों का सेवन नहीं किया जाता है।

मन्नतधारी व्यक्ति जमीन पर सोता है। जबकि मेले में शामिल होते हैं हजारों लोग। एक सप्ताह पहले से खुशबूदार साबुन, पावडर जैसी सौन्दर्य सामग्री खरीदने का क्रम शुरू हो जाता है। नए कपड़ों की खरीददारी की जाती है। फिर निगाहें खोजती हैं किसी अपने को। इसे आधुनिक प्रेम परिभाषा के जरिए नहीं समझा जा सकता। इसमें वादों का कोई स्थान नहीं। सौंदर्य का आकर्षण भी उतना महत्वपूर्ण नहीं है। दोनों के बीच पैसा कोई स्थान नहीं रखता। पत्थर पर खिल गए गुलाब की तरह भगोरिए का प्यार होता है। पत्थर दिलों पर भगोरिया प्रेम की लकीरें बनाता है। पत्थर की तरह ये निशान लंबी उम्र पाते हैं।

लोकगीतों की धुनों व परंपरागत वाद्यों, खासकर बाँसुरियों की धुन पर थिरकते लोगों की टोलियाँ जब पारम्परिक पोशाकों के साथ मेले में आती हैं तो मन होली की मस्ती से झूमने लगता है। भगोरिया प्राकृतिक आनंद का प्रतीक है जो जीवन के अभावों व उनसे उत्पन्न मायूसी पर विजय का उद्घोष करता है। अभावों पर आनंद का छींटा है। बाहरी दुनिया इसे आँखों को तसल्ली देने वाला रैंप मान लेती है।

भोली सुंदरता की नुमाइश समझ बैठती है। लेकिन भगोरिया न तो फैशन परेड का रैंप है और न ही जिस्म नुमाइश का अवसर। यह तो इंतजार की पराकाष्ठा पर प्राप्त स्वयं को गुनगुनाने वाला, मस्ती से भरा एक पल है- क्षण है जो जिंदगी से भी बड़ा होता है। इसे तभी समझा जा सकता है जब दुनियादारी की विकसित खोह से बाहर निकलकर आदि मानव की तरह प्रकृति के समीप जाकर स्वयं के जीवन को संगीत की तरह सुना जाए।

बाजारू व बिकाऊ प्रतीकों को छोड़कर पेड़ पर लगे एक ही फूल को जब दो अलग-अलग हाथ एक साथ छूते हैं, तब भगोरिए के मर्म को समझा जा सकता है। दिमाग के उस्ताद बनकर, पंडित-ज्ञानी बनकर भी भगोरिए को नहीं देखा जा सकेगा। पागल बनकर, दीवाना बनकर, दिमाग के निर्देशों से नाता तोड़कर दिल के निर्देश पर आँखों को खोलकर भगोरिया देखा जाता है। जो ऐसा कर सकते हैं उन्हें आमंत्रण है। वे आएँ 15 से 21 मार्च तक झाबुआ, धार, खरगोन में और मुस्कराते टेसू, गुनगुनाते लोकगीत, गूँजती बाँसुरी व थिरकते कदमों को अपने जीवनभर के गम सौंप दें।

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