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काशी में क्यों खेली जाती है श्मशान की राख से होली, मसाने की होली में रंग की जगह क्या है चिता की भस्म का भेद

Written By WD Feature Desk
Updated: बुधवार, 26 फ़रवरी 2025 (18:24 IST)
Masane Ki Holi 2025: सनातन धर्म में होली एक महत्वपूर्ण उत्सव है। पूरे देश में यहां त्योहार अलग-अलग तरीके से बनाया जाता है ब्रज में लड्डू होली लट्ठमार होली का आकर्षण होता है।  साथ ही भारत में होली रंग और गुलाल से खेली जाती है। लेकिन अगर हम काशी की होली की बात करें तो यहां होली पर एक अनोखा ही रंग देखने को मिलता है जब शमशान की राख से महादेव के संग होली खेली जाती है।

काशी में फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी के अगले दिन हर साल मसान होली का उत्सव मनाया जाता है। इस होली में लोग अधिक संख्या में शामिल होते हैं। इस दिन लोग चिता की राख से होली खेलते हैं और देवों के देव महादेव की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। आइए आपको बताते हैं कि काशी में चिता की राख से ही क्यों होली खेली जाती है।

चिता की राख से होली खेलने के पीछे क्या है कारण 
काशी में खेली जाने वाली मसान होली को चिता भस्म होली के नाम से भी जाना जाता है। चिता की राख से खेली जाने वाली यह होली देवों के देव महादेव को समर्पित है। मसान की होली को मृत्यु पर विजय का प्रतीक माना गया है।
धार्मिक मान्यता है कि भोलेनाथ ने यमराज को हराने के बाद चिता की राख से होली खेली थी। तभी से इस दिन को यादगार बनाने के लिए प्रत्येक वर्ष मसान होली खेली जाती है। 2 दिन तक मनाए जाने वाले इस उत्सव में पहले दिन लोग चिता की राख को एकत्रित करते हैं और इसके दूसरे दिन होली खेलते हैं।

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ऐसे मनाते हैं मसाने की होली
चिता की राख से होली खेलने का ये अदभुत नजारा आपको सिर्फ काशी में ही देखने को मिलेगा। मसान की गली में लोग हर हर महादेव के जयकारों के साथ मृत्यु का जस्ट मानते हैं। फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को भगवान भोलेनाथ अपने औघड़ रूप में काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच चिता की भस्म की होली खेलते हैं।  मृत्यु का यह उत्सव कुछ इस तरह बनता है कि एक तरफ घाट पर चिता जलती है और दूसरी और गीत संगीत के बीच होली का त्यौहार मनाया जाता है।

जिनका शव आता उन्हें मिलती है मुक्ति: मान्यता है कि मृत्यु के बाद जो भी शवमणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के लिए आते हैं, बाबा उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं। मान्यता है कि जिस राम-नाम के जप के साथ शव महाश्मशान पहुंचता है तो शिव अपने आराध्य राम के पांव की धूल रूपी चिताभस्म को माथे पर लगा कर मर्यादा पुरुषोत्तम को अपना सम्मान अर्पित करते हैं।

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