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होली : पर्व का महत्व और पौराणिक कथा

Updated: सोमवार, 6 मार्च 2017 (18:31 IST)
होली का पर्व बहुआयामी है। इस दिन समाज से ऊंच-नीच, गरीब-अमीर जैसी विभाजक भावनाएं विलुप्त हो जाती हैं। यह पर्व खेती-किसानी से भी जुड़ा है इसीलिए तो जलती होली में गेहूं की बालियों को भूनने का महत्व है। 
होली दहन विधि : होली उत्साह और उमंग से भरा त्योहार और उत्सव है। विष्णु भक्त इस दिन व्रत भी रखते हैं। होलिका दहन के लिए लोग महीनेभर पहले से तैयारी में जुटे रहते हैं। सामूहिक रूप से लोग लकड़ी, उपले आदि इकट्ठा करते हैं और फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन संध्या काल में भद्रा दोषरहित समय में होलिका दहन किया जाता है। होली जलाने से पूर्व उसकी विधि-विधान सहित पूजा की जाती है और अग्नि एवं विष्णु के नाम से आहुति दी जाती है। 
 
होलिका दहन के दिन पवित्र अग्नि के चारों ओर लोग नृत्य करते हैं और लोकगीत का आनंद लेते हैं। इस दिन राधा-कृष्ण की लीलाओं एवं ब्रज की होली की धुन गलियों में गूंजती रहती है और लोग आनंद-विभोर रहते हैं। होलिका दहन के दिन लोग अपने-अपने घरों में खीर और मालपुआ बनाकर अपनी कुलदेवी और देवता को भोग लगाते हैं।
 
प्राचीन कथा : होली की पूर्व संध्या में होलिका दहन किया जाता है। इसके पीछे एक प्राचीन कथा है कि दीति का पुत्र हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से घोर शत्रुता रखता था। इसने अपनी शक्ति के घमंड में आकर स्वयं को ईश्वर कहना शुरू कर दिया और घोषणा कर दी कि राज्य में केवल उसी की पूजा की जाएगी। उसने अपने राज्य में यज्ञ और आहुति बंद करवा दी और भगवान के भक्तों को सताना शुरू कर दिया।
 
हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के लाख कहने के बावजूद प्रहलाद विष्णु की भक्ति करता रहा। असुराधिपति हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने की भी कई बार कोशिश की, परंतु भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते रहे और उसका बाल भी बांका नहीं हुआ। 
 
असुर राजा की बहन होलिका को भगवान शंकर से ऐसी चादर मिली थी कि जिसे ओढ़ने पर अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। होलिका उस चादर को प्रहलाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ गई। दैवयोग से वह चादर उड़कर प्रहलाद के ऊपर आ गई जिससे प्रहलाद की जान बच गई और होलिका जल गई। होलिका दहन के दिन होली जलाकर 'होलिका' नामक दुर्भावना का अंत और भगवान द्वारा भक्त की रक्षा का जश्न मनाया जाता है।
 
होली रंगोत्सव : होली का त्योहार प्रेम और सद्भावना से जुड़ा त्योहार है जिसमें अध्यात्म का अनोखा रूप झलकता है। इस त्योहार को रंग और गुलाल के साथ मनाने की परंपरा है। इस त्योहार के साथ कई पौराणिक कथाएं एवं मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। 
 
होली पौराणिक तथ्य : होली का त्योहार भारतवर्ष में अति प्राचीनकाल से मनाया जाता आ रहा है। इतिहास की दृष्टि से देखें तो यह वैदिक काल से मनाया जाता आ रहा है। हिन्दू मास के अनुसार होली के दिन से नए संवत की शुरुआत होती है। चैत्र कृष्ण प्रतिप्रदा के दिन धरती पर प्रथम मानव मनु का जन्म हुआ था। इसी दिन कामदेव का पुनर्जन्म हुआ था। इन सभी खुशियों को व्यक्त करने के लिए रंगोत्सव मनाया जाता है। नरसिंह रूप में भगवान इसी दिन प्रकट हुए थे और हिरण्यकश्यप नामक महासुर का वध कर भक्त प्रहलाद को दर्शन दिए थे


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