कही-अनकही 5 : कच्चे आलू


'हमें लगता है समय बदल गया, लोग बदल गए, समाज परिपक्व हो चुका। हालांकि आज भी कई महिलाएं हैं जो किसी न किसी प्रकार की यंत्रणा सह रही हैं, और चुप हैं। किसी न किसी प्रकार से उनपर कोई न कोई अत्याचार हो रहा है चाहे मानसिक हो, शारीरिक हो या आर्थिक, जो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, क्योंकि शायद वह इतना 'आम' है कि उसके दर्द की कोई 'ख़ास' बात ही नहीं। प्रस्तुत है एक ऐसी ही 'कही-अनकही' सत्य घटनाओं की एक श्रृंखला। मेरा एक छोटा सा प्रयास, उन्हीं महिलाओं की आवाज़ बनने का, जो कभी स्वयं अपनी आवाज़ न उठा पाईं।'
कच्चे आलू
दृश्य 1: रात का समय
‘आदि, क्या बना दूं खाने में?’
‘देख लो क्या है... आलू हों तो आलू की सब्जी बना दो रस वाली...’
‘ठीक है, तुम्हारे लिए ताज़ा बना देती हूं और मैं सुबह के दाल-चावल फ्राय कर के खा लूंगी... फालतू वेस्ट हो जाएगा वरना...’
‘ठीक है...’

दृश्य 2:
खाने के बाद...
‘एना, हमारे पास पुदीन हरा है क्या?’
‘शायद नहीं... क्या हुआ?’
‘कुछ नहीं... थोड़ा पेट दर्द हो रहा है... अरे अमेरिका वाली दीदी का वीडियो कॉल आ रहा है... मैं बात करता हूं...’
‘ठीक है, मैं बर्तन मांज देती हूं तब तक...’
‘एना, सुनो! लो दीदी को तुमसे बात करनी है... बात कर लो... मैं आता हूं पार्किंग से...’
‘ठीक है...’
दीदी से बात करने के दौरान अचानक आदि के फ़ोन पर उसकी ‘ख़ास दोस्त’ दीया के मेसेज का नोटिफिकेशन आता है- एक के बाद एक...
‘तुम ठीक हो?’’पेट दर्द ठीक हुआ तुम्हारा?’ ‘पुदीन हरा मिला?’
एना दीदी से बात करने के बाद सारे मेसेज देखती है...

‘एक बात बताओ दीया, कच्चे आलू खाने से पेट दुखता है क्या?’
‘क्यों? किसने खाए? हो सकता है...’
‘अभी खिलाए डिनर में एना ने...’
‘तो तुमने कहा क्यों नहीं उसको कि आलू कच्चे हैं? वो तो आलू काटते समय दिख जाता है न की कच्चे हैं?’
‘हां बोला था उसको मैंने दीया, वो बोली पक जाएंगे अभी कुकर में... थोड़े कच्चे रह गए... उसने खुदने तो खाया नहीं.. खुद तो दाल-चावल खा लिए... मैं बोल के घर में क्लेश नहीं चाहता... कौन समझाए फालतू उसको... सुनती भी कहां है वो... अब पेट दुःख रहा है...’
अरे... ध्यान ही नहीं रखती वो तुम्हारा... तुम पुदीन हरा ले लो...’ ‘तुम ठीक हो?’ ‘पेट दर्द ठीक हुआ तुम्हारा?’’मिला क्या पुदीन हरा?’

दृश्य 3 : तीन दिन बाद रात को...
‘वहां क्यों खडी हो जबसे एना, कुकर में है सब्जी, हो जाएगी अपने आप... आ कर बैठ जाओ.. देख लो टीवी...’
‘नहीं फिर कच्चे रह जाएंगे न आलू...’
‘नहीं रहेंगे... आ जाओ...’
‘नहीं, फिर तो तुम्हारा पेट दुखेगा कच्चे आलू से...’
‘अरे किसका पेट दुखता है कच्चे आलू से? क्या नया नाटक है? आ जाओ तुम...’
‘नहीं फिर तुम अपनी दोस्तों को कहोगे ना, कि कैसे मैं तुम्हें कच्चे आलू खिलाती हूं, ध्यान नहीं रखती.. फिर तुम्हारा पेट दुखता है... फिर वो चिंता करेंगी तुम्हारी,.. है न?’
‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे मेसेज पढ़ने की? और दूसरी बात... तुमको बुरा लग जाता इसलिए तुम्हें बताया नहीं मैंने... वो कम से कम परवाह तो करती है मेरी... और किसी से तो पूछना पड़ेगा ना कि पेट दुःख रहा है तो क्या करूं... तुमसे क्या पूछूं? खाना तक तो ठीक से नहीं बना पाती हो तुम...’
क्या किसी महिला मित्र से शादी के बाद भी इतने अंतरंग सम्बन्ध होना, कि अपनी पत्नी से हुई गलतियां जता कर सहानुभूति पाना सही है? खैर, ये तो ‘कही-अनकही’ बातें हैं, सोच कर एना बिना कुछ कहे सोने चले गई।




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