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प्रेम लघुकथा : निशब्द...

Updated: शनिवार, 13 फ़रवरी 2016 (13:40 IST)
एक शब्द जिसे हर रोज न जाने कितनी बार कहा होगा परंतु आज अचानक उसी शब्द को कहना है परंतु दिल है कि सही मौके के इंतजार में है। शब्द तो वही है परंतु इस बार उसे एक अलग एम्बियंस (माहौल) चाहिए। सुबह 5 बजे उठी जिंदगी अब 10 बजे के करीब पहुंच चुकी है परंतु रोजमर्रा की आम बातचीत में भी वह शब्द अनुपस्थित हैं। दो जिंदगियां ऑफिस पहुंच जाती है और थोड़ी खामोशी वहां भी स्पष्ट दिखाई देती है। शाम को ऑफिस छूटने के थोडा पहले एक‍ जिंदगी का फोन दूसरी के पास आता है परंतु फिर वही बात थोड़ी-सी खामोशी शब्दों पर भारी पड़ जाती है। सिर्फ एक स्वीकारोक्ति और जिंदगियां चल पड़ती है एक रेस्त्रां की खामोश टेबल पर आमने-सामने बैठने।

कैंडल लाइट में एक जिंदगी अपने हाथ बढ़ाती है दूसरी जिंदगी को थामने और फिर एक छोटे गिफ्ट के साथ धीरे से सुनाई देता है वह शब्द जिसके कारण दिन भर से बाते कम और खामोशी ज्यादा थी। और फिर उस शब्द को सुनने के बाद जिंदगी की वह थोड़ी सी खामोशी और बढ़ जाती है, वह बदल जाती है पूर्ण खामोशी में और अब बातें करती है तो सिर्फ आंखें..निशब्द...
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भीका शर्मा
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