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दशहरे पर कविता : मेरे जैसा वीर कोई नहीं था

गुरुवार,अक्टूबर 22, 2020
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यह सिंदूरी आभा लेकर..अष्टभुजा सी उर्जा पाएं...जग जननी तू...मैं घर की मां...
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मां आई हो जो इस दफा तो जाना नहीं, रुको देखो जरा गिरते हुए मानदंडों को, बिखरते मुक्त स्वप्नों को
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लचर कानून व्यवस्था और महिलाओं पर होने वाले अत्याचार पर रचना
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नई सोच है, नई चेतना, बदला जीवन सबका, बेटी युग के नए दौर में, हर्षाया हर तबका।
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चारों तरफ दिख रहे हैं, दुनिया में नकाब लगाए लोग, आपसे मिलने, बतियाने से हाथ मिलाने से घबराते हुए
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हिन्दी कविता : काली स्याह रात

बुधवार,अक्टूबर 7, 2020
कहीं दूर अंधेरे में कर्कश चीत्कार, झुंड में जंगली कुत्ते, और एक हिरणी डरी-सहमी
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हिन्दी कविता : सांवली-सी लडकी

सोमवार,अक्टूबर 5, 2020
सांवली-सी लड़की लिखाती कविता, प्रेम भरे नयनों से, भिगोती हमेशा....
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अपने तप बल से, उठना है तुम्हें, अत्याचार तिरस्कार नफरतों की खाइयों दरिंदगी के नर्क से न सहना जुल्म वीरांगनी
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तुम, सिर्फ एक दिन जीने के लिए क्यों जिए बापू और/ क्यों शहीद हुए? तुम्हारे ही देश में-जहां देखा था
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बोझिल मन अकेला खालीपन बढ़ती उम्र। सारा जीवन तुम पर अर्पण अब संघर्ष।
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देश के प्रति उनका प्रेम, दीवानगी और मर मिटने का भाव, उनके शेर-ओ-शायरी और कविताओं में साफ दिखाई देता है, जो आज भी युवाओं में आज भी जोश भरने का काम करता है। पढ़ें भगत सिंह के वतन पर लिखे यह 7 शेर -
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बेटियों के दिन नहीं युग होते हैं बेटियां सृष्टि नहीं दृष्टि होती हैं बेटियां ‍विश्वास हैं आभास हैं साथ हैं तो श्वास है...
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सच्ची लगन, कर्मनिष्ठा और निरंतर प्रयास से उच्च शिखर पर बढ़ती रहो, अपनी लक्ष्मण-रेखा स्वयं खींच कर मान-सम्मान की गरिमामयी घृत दीपज्योति, पवित्र आगंन की श्याम तुलसी, चौरे की राम तुलसी जैसी मर्यादित, सागर सी गंभीरता, आकाश की ...
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राह देखता तेरी बेटी, जल्दी से तू आना किलकारी से घर भर देना, सदा ही तू मुस्काना ना चाहूं मैं धन और वैभव, बस चाहूं मैं तुझको तू ही लक्ष्मी, तू ही शारदा, मिल जाएगी मुझको सारी दुनिया है एक गुलशन, तू इसको महकाना किलकारी से घर भर देना, सदा ही तू ...
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आने दो बेटियों को धरती पर मत बजाना थाली चाहे वरना कौन गाएगा गीत अपने वीरों की शादी में आने दो बेटियों को धरती पर पनपने दो उनके भ्रूण वरना कौन धारण करेगा तुम्हारे बेटों के भ्रूण आने दो बेटियों को धरती पर मत बजाना थाली चाहे।
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रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।
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ग्रीष्म के दिनों में आम, जाड़े के दिनों में जाम, बाग में खिले कुसुम मंद-मंद बहती समीर
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हिन्दी कविता : अजन्मी का जन्म

शुक्रवार,सितम्बर 18, 2020
रोजगार ढूंढता पति, वो ससुराल में है पड़ी कैसे चले घर का खर्च ये आफत भी आन पड़ी,शर्म नहीं आई ऐसे में, हो गई गर्भवती तू
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हिन्दी में बेरोजगारी पर कविता- मैं एक बेरोजगार हूं कर रहा बेगार हूं, बड़े-बुजुर्गों की आंख से मैं आज बेकार हूं। इम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज मेरा आज शिवाला है, फॉर्म भरते-भरते मेरा निकल गया दिवाला है।
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