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24 जनवरी, राष्ट्रीय बालिका दिवस पर कविता : मुड़कर नहीं देखती हैं भारत की बेटियां।

रविवार,जनवरी 24, 2021
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बेटी युग में खुशी-खुशी है, पर मेहनत के साथ बसी है। शुद्ध कर्म-निष्ठा का संगम, सबके मन में दिव्य हंसी है।
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गणतंत्र दिवस 2021- अपना वतन जान से प्‍यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा, गंगा यमुना सरस्वती जैसी
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गणतंत्र दिवस का मौका पूरे देश के लिए गर्व और गौरव का विषय है। इस अवसर पर पूरे देश में पूरी गरिमा के साथ आयोजन किए जाते हैं। आइए इस अवसर पर आपके लिए प्रस्तुत हैं खासतौर से गणतंत्र दिवस को ध्‍यान में रखकर लिखी गई खास कविता-
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हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा! हाय, मेरी कटु अनिच्छा! था बहुत मांगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया! था तुम्हें मैंने रुलाया!
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हरिवंश राय बच्चन की कविता- आ रही रवि की सवारी। नव-किरण का रथ सजा है, कलि-कुसुम से पथ सजा है, बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी।
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हिन्दी काव्य प्रेमियों में हरिवंश राय बच्‍चन सबसे अधिक प्रिय कवि रहे हैं और सर्वप्रथम 1935 में प्रकाशित उनकी 'मधुशाला' आज भी लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर है। यहां पढ़ें हरिवंश राय बच्‍चन की सबसे लोकप्रिय कविता-
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अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! वृक्ष हों भले खड़े, हो घने, हो बड़े, एक पत्र-छांह भी मांग मत,
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चाहती हूं कि इन रंगों को रख दो मेरी हथेलियों पर कि जब मैं निकलूं तपती हुई पीली दोपहर में अकेली तो इन्हें छिड़क सकूं...दुनिया की कालिमा पर मुझे इसी कैनवास पर तुम्हारे दिए रंग सजाना है प्यार कितना खूबसूरत होता है सबको बताना है...
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मकर संक्रांति खुशियों का पर्व है। इस दिन दिल में उमंगें जवान होती है। हर तरफ हर्ष और उल्लास का माहौल रहता है। लोग पतंग उड़ाते हैं और साथ में उन पतंगों पर शेरो-शायरी भी लिखते हैं। आइए जानते हैं 20 दिलचस्प शायरी पतंग पर लिखने के लिए...
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सब रिश्तों से फुरसत, मिल जाए तो। आ जाना जल्दी से,ऐसा न हो देरी हो।
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मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना, गैरों को गले न लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना।
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हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय! मैं शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार-क्षार। डमरू की वह प्रलय-ध्वनि हूं जिसमें नचता भीषण संहार।
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भोपाल गैस कांड पर कविता- हर कोई नीलकंठ, तो नहीं हो सकता जो निगल ले, उस हलाहल को,
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रस रस हर क्षण में, रस रस हर बात में... सुनता कोई, कुछ कहें, रस घोल जाता जीवन में...
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चांद नहीं कहता तब भी मैं याद करती तुम्हें चांद नहीं सोता तब भी मैं जागती तुम्हारे लिए चांद नहीं बरसाता अमृत तब भी मुझे तो पीना था विष चांद नहीं रोकता मुझे सपनों की आकाशगंगा में विचरने से फिर भी मैं फिरती पागलों की तरह तुम्हारे ख्वाबों की रूपहली ...
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सर्वकालिक महान विद्वान प्रकांड पंडित भविष्यवेत्ता महान वैज्ञानिक तीनों लोकों में मेरे जैसा वीर कोई नहीं था।
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यह सिंदूरी आभा लेकर..अष्टभुजा सी उर्जा पाएं...जग जननी तू...मैं घर की मां...
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मां आई हो जो इस दफा तो जाना नहीं, रुको देखो जरा गिरते हुए मानदंडों को, बिखरते मुक्त स्वप्नों को
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लचर कानून व्यवस्था और महिलाओं पर होने वाले अत्याचार पर रचना
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