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सपने ताजमहल के हैं

- बालस्वरूप राही

Written By WD
Updated: सोमवार, 1 दिसंबर 2008 (15:28 IST)
हम मेहमाँ दो पल के हैं

कहने को दो पलकें हैं
कितने सागर छलके हैं

मदिरालय की मेजों पर
सौदे गंगाजल के हैं

नई सुबह के क्या कहने
ठेकेदार धुँधलके हैं

जो आधे में छूटी हम
मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं

बिछे पाँव में किस्मत है
टुकड़े तो मखमल के हैं

रेत भरी है आँखों में
सपने ताजमहल के हैं

क्या दिमाग का हाल कहें
सब आसार खलल के हैं

सुने आपकी राही कौन
आप भला किस दल के हैं ।

साभार : समकालीन साहित्य समाचार
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