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Written By WD

मैं सूरज बनके एक दिन

जफर गोरखपुरी

जफर गोरखपुरी
बदन कजला गया तो दिल की ताबानी से निकलूंगा
मैं सूरज बनके एक दिन अपनी पेशानी से निकलूंगा

मुझे आंखों में तुम जां के सफर की मत इजाजत दो
अगर उतरा लहू में फिर आसानी से ननिकलूंग

नजर आ जाऊंगा मैं आंसुओं में जब भी रोओगे
मुझे मिट्टी किया तुमने तो मैं पानी से निकलूंगा

मैं ऐसा खूबसूरत रंग हूं दीवार का अपनी
अगर निकला तो घरवालों की नादानी से निकलूंगा

जमीरे-वक्त में पैवस्त हूं मैं फांस की सूरत
जमाना क्या समझता है कि आसानी से निकलूंगा

यही एक शै है जो तनहा कभी होने नहीं देती
जफर मर जाऊंगा जिस दिन परेशानी से निकलूंगा।
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WD