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पीले पड़ गए उन पन्नों पर

Written By WD
Updated: गुरुवार, 10 जुलाई 2014 (07:15 IST)
- आकांक्षा पार े
NDND
पीले पड़ गए उन पन्नों पर
सब लिखा है बिल्कुल वैसा ही।

काग़ज की सलवटों के बीच
बस मिट गए कुछ शब्द

मगर
उन अस्पष्ट अक्षरों को

पढ़ सकती हूँ बिना रुके आज भी
बित्ते भर की चिंदी में
समाई हुई हूँ मैं।

अनपढ़ लिखावट से
लिखी गई है

एक अल्हड़ प्रणय गाथा
उसमें मौजूद है

साझे सपने, साझा भय,
झूले से भी लंबी प्रेम की पींगें

मौजूद है उसमें
मुट्‌ठी में दबे होने का गर्म अहसास

क्षण भरी को खुली हथेली की ताज़ा साँस
फिर पसीजती हथेलियों में कैद होने की गुनगुनाहट

अर्से से पर्ची ने देखी नहीं धूप
न वह ले पाई है चैन की नींद

कभी डायरी तो कभी संदूकची में छुपती रहती है
यहाँ-वहाँ

ताकि कोई देख न ले
और जान न जाए
चिर-स्वयंवरा होने का राज़।

साभार : वागर्थ

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