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तू भी घर को लौट मछेरे
कैलाश गौतम अब मत फेंको, जाल समेटोडूब रहे सूरज को देखोलौट रहे घर पँछी अपनेतू भी घर को लौट मछेरेतू भी घर को लौटतूने बहुत उड़ाई मौज मछेरेबहुत उड़ाई मौज।आँख गड़ाया, दाँत लगायाहरकत से तू बाज न आयादृष्टि न बदली सोच न बदलीजीवन भर तू मुँह की खायाकाम न आई नाकेबंदीकाम न आई फौज मछेरेकाम न आई फौज।देखा, छुआ, बराया, बीछाकागज, पत्थर, लकड़ी, शीशासदा रहा सीमा से बाहरकभी न सोचा आगा-पीछाचला दौर पर दौर बराबरलगी छौंक पर छौंक मछेरेलगी छौंक पर छौंक।
खूब बटोरा, खूब समेटाअब तो खोल कमर का फेंटासिरहाने-पैताने-बैठेघड़ी देखते बेटी-बेटातेरा पहरा बीत गया तूघर की चाबी सौंप मछेरेघर की चाबी सौंप।