तू भी घर को लौट मछेरे
कैलाश गौतम
अब मत फेंको, जाल समेटो
डूब रहे सूरज को देखो
लौट रहे घर पँछी अपने
तू भी घर को लौट मछेरे
तू भी घर को लौट
तूने बहुत उड़ाई मौज मछेरे
बहुत उड़ाई मौज।
आँख गड़ाया, दाँत लगाया
हरकत से तू बाज न आया
दृष्टि न बदली सोच न बदली
जीवन भर तू मुँह की खाया
काम न आई नाकेबंदी
काम न आई फौज मछेरे
काम न आई फौज।
देखा, छुआ, बराया, बीछा
कागज, पत्थर, लकड़ी, शीशा
सदा रहा सीमा से बाहर
कभी न सोचा आगा-पीछा
चला दौर पर दौर बराबर
लगी छौंक पर छौंक मछेरे
लगी छौंक पर छौंक।
खूब बटोरा, खूब समेटा
अब तो खोल कमर का फेंटा
सिरहाने-पैताने-बैठे
घड़ी देखते बेटी-बेटा
तेरा पहरा बीत गया तू
घर की चाबी सौंप मछेरे
घर की चाबी सौंप।
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डूब रहे सूरज को देखो
लौट रहे घर पँछी अपने
तू भी घर को लौट मछेरे
तू भी घर को लौट
तूने बहुत उड़ाई मौज मछेरे
बहुत उड़ाई मौज।
आँख गड़ाया, दाँत लगाया
हरकत से तू बाज न आया
दृष्टि न बदली सोच न बदली
जीवन भर तू मुँह की खाया
काम न आई नाकेबंदी
काम न आई फौज मछेरे
काम न आई फौज।
देखा, छुआ, बराया, बीछा
कागज, पत्थर, लकड़ी, शीशा
सदा रहा सीमा से बाहर
कभी न सोचा आगा-पीछा
चला दौर पर दौर बराबर
लगी छौंक पर छौंक मछेरे
लगी छौंक पर छौंक।
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अब तो खोल कमर का फेंटा
सिरहाने-पैताने-बैठे
घड़ी देखते बेटी-बेटा
तेरा पहरा बीत गया तू
घर की चाबी सौंप मछेरे
घर की चाबी सौंप।

