Love poem | तुम्हारी आवाज का शहद
फाल्गुनी
ईद की खुशी बनकर
कानों में जो टपका
तुम्हारी आवाज का शहद
छम-छम नाच उठा
मन का मयूर और
टूट गई बाँधी हुई तुम्हारी हर हद।
बिखर गई कसमें
बिसर गई रस्में
बस याद रहे तुम
और तुम्हारी आवाज का उजाला
जिसने रात भर मुझे एक दुआ बना डाला।
कानों में जो टपका
तुम्हारी आवाज का शहद
छम-छम नाच उठा
मन का मयूर और
टूट गई बाँधी हुई तुम्हारी हर हद।
बिखर गई कसमें
बिसर गई रस्में
बस याद रहे तुम
और तुम्हारी आवाज का उजाला
जिसने रात भर मुझे एक दुआ बना डाला।

