| आग लगाता-सा लगे, फागुन अब के साल। रंगों की बौछार में, ताजमहल-सी देह, मोरपंख से मन उगे, सुआपंखियाँ-नेह। खट्टी-मीठी चिट्ठियाँ, फगुनाहट की बाँच, सपनों के वन में भरे, मन का हिरन कुलाँच। खिली-खिली-सी चाँदनी, धूली-धूली-सी धूप, बौराई इस गंध में, बहके-बहके रूप। साधों की नदिया चढ़ी, कोई ना ठहराव, पाल खुले तूफान में, डगमग होती नाव। अंग छरहरी नीम के, उठती मीठी पीर, अभी-अभी तो हँस रही, अभी-अभी गंभीर। गूँजे सारे गाँव में, ढोलक ताशे फाग, पिया बसे परदेश में, सारे विरहा-राग। तन की मीठी झील में, खिले कमल के फूल, हल्दी बोरी चिट्ठियाँ, अब तो करो कबूल। |