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जिसे बेहद चाहता हूँ मैं

निकोलाई रूबत्सोव

निकोलाई रूबत्सोव
पुश्किन,ब्लोक और येसेनिन की परम्परा में जिस नए कवि का नाम रस में लिया जाता है,वह है निकोलाई रूबत्सोव (1936-1971)। कवि रूबत्सोव ने अपने गीतों और कविताओं में रूसी जनजीवन की आत्मा को गहराई के साथ व्यक्त किया है। उन्होंने ढेरों प्रेम कविताएँ लिखी हैं। उनके प्रेमगीत आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। उनके जीवन की विडम्बना यह है कि प्रेम का कवि अपनी प्रेमिका के ही हाथों मारा गया। उनकी प्रेमिका ने उनका गला घोंट दिया।

NDND
गुलदस्ता
मैं देर तक साइकिल चलाता रहूँगा
और फिर दूर कहीं
एकांत जंगल में उगे फूलों को देख
उतर पडूँगा। साइकिल से
एक गुलदस्ता बनाऊँगा मैं
और ले जाकर दूँगा उस लड़की को
जिसे प्यार करता हूँ मैं

मैं उससे कहूँगा-
किसी दूसरे के साथ है अब तू
भूल चुकी है हमारी वह मुलाकातें
इसलिए अब अपनी याद दिलाने को
ले तुझे भेंट करता हूँ मैं ये साधारण फूल
गुलदस्ता ले लेगी वह

धुँध गहरा जाएगी उस शाम
उदास हो उठेगी वह
आँखें झुका लेगी
और मुस्कुराए बिना ही आगे बढ़ जाएगी

मैं देर तक साइकिल खींचता रहूँगा
और फिर एकांत जंगल में
कहीं रुक जाऊँगा
सिर्फ इतनी इच्छा है मेरी
कि वह लड़की
जिसे बेहद चाहता हूँ मैं
ले ले मुझसे गुलदस्ता

वह
वह अभी
बिल्कुल बच्ची है
आवाज तक उसकी कच्ची है
खेलों की दुनिया में उलझी
मन से एकदम सच्ची है

NDND
-चलों,चलें उस जंगल में
जहाँ गाती है कोयल
थोड़ा भीतर तक जाएँगे
जहाँ बेंच पड़ी एक पाएँगे
हो जाएँगे आँखों से ओझल

-चलों, दौड़ें उस खेत में
मैं चढ़ती हूँ पेड़ पर
तुम बैठो उस मेड़ पर
मैं सहमत-सा होता हूँ
मन पर बोझा-सा ढोता हूँ
NDND
मन में खुद से
मैं लड़ता हूँ
जीवन में सब-कुछ है झेला
ऊँच-नीच सोच के मरता हूँ
जब होता उसके साथ
अकेला

कभी
उदास वह होती है
और कभी इतनी गम्भीर
शायद घबरा जाए वह सुनकर
मेरी उलझन
मेरी पीर

क्यूँ घूमूँ मैं
उसके साथ
क्यूँ जाता हूँ जंगल
क्यूँ सुनता हूँ कोयल को
वो जंगल में करती मंगल

कहाँ जाएँगे उड़कर...

हम आज़ाद होंगे
पँछियों की तरह-
तुम फुसफुसाती हो
और उदास आँखों से
आकाश में उड़ते पक्षियों को देखती हो

पक्षी कैसे
उड़ते चले जाते हैं दूर तक
समुद्र के ऊपर
समुद्री झंझावातों के पार
मुझे भी
घेर लेती है उदासी
पसन्द है मुझे भी वह

पर पक्षी है वह
किसी दूसरी उड़ान का
साथ-साथ
हम भला कहाँ जाएँगे उड़कर?