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कविता : शिल्पकार

Updated: शनिवार, 19 मई 2018 (15:30 IST)
तुम,
सचमुच महान हो 
शिल्पकार-
 
तुम्हारे हाथ 
नहीं दुलारते बच्चों को 
न ही गूंथते हैं फूल 
अर्द्धांगिनी के केशों में 
बस, उलझे रहते हैं 
'ताज' बनाने में-
 
और/ बाद में
फेंक दिए जाते हैं
काटकर
तब भी/ आखिर क्यों
नहीं कम होता
तुम्हारा
'ताज' के प्रति अनुराग?
लेखक के बारे में
सुबोध श्रीवास्तव
परिचय : जन्म- 4 सितंबर 1966, शिक्षा- परास्नातक। 'आज' (हिन्दी दैनिक), कानपुर में कार्यरत। कई पुस्तकों का प्रकाशन, देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। दूरदर्शन, आकाशवाणी से प्रसारण। गणेश शंकर विद्यार्थी अतिविशिष्ट सम्मान प्राप्त तथा 'काव्ययुग' ई-पत्रिका का संपादन।.... और पढ़ें

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