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हिन्दी कविता : वृक्ष..

Updated: बुधवार, 23 नवंबर 2016 (11:42 IST)
वृक्ष धरा का भूषण है
यह प्रतिपल नूतन आभूषण है


 
जन-जन का यह जीवनदाता
देश का है यह भाग्य-विधाता
 
कबहुं वृक्ष नहि निज फल चखता
परमारथ का संगीत सुनाता
 
पानी को यह संचित कर
सृष्टि को नवजीवन देता
 
प्राणीमात्र का जीवनदाता
पशु-पक्षी का शरणदाता
 
यह है अद्भुत त्यागी-बलिदानी
अचरज करते ऋषि-मुनि ज्ञानी
 
इसके त्याग की कहानी
गाते-सुनाते जन-मन वाणी
 
यह अनुपम धरोहर है राष्ट्र की
इसे सहेजो प्राण त्यागकर
 
यदि तुम इसे सहेज पाओगे
सृष्टि के संरक्षक कहलाओगे। 
लेखक के बारे में
राकेशधर द्विवेदी
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