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हिन्दी कविता : सरहदें...

Updated: शनिवार, 12 अगस्त 2017 (13:16 IST)
कई सरहदें बनीं लोग बंटते गए,
हम अपनों ही अपनों से कटते गए।
 
उस तरफ कुछ हिस्से थे मेरे मगर,
कुछ अजनबी से वो सिमटते गए।
 
दर्द बढ़ता गया दूरियां भी बढ़ीं,
सारे रिश्ते बस यूं ही बिगड़ते गए।
 
दर्द अपनों ने कुछ इस तरह का दिया,
वो हंसता रहा मेरे सिर कटते गए।
 
खून बिखरा हुआ है सरहदों पर मगर,
वो भी लड़ते गए हम भी लड़ते गए।
 
एक जमीन टुकड़ों में बंटती गई,
हम खामोशी से सब कुछ सहते गए।
 
सरहदों की रेखाएं खिंचती गईं,
देश बनते रहे रिश्ते मिटते गए।
 
लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें
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