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कविता : नहीं चाहिए चांद

Updated: शुक्रवार, 10 अगस्त 2018 (17:09 IST)
मुझे
नहीं चाहिए चांद/और
न ही तमन्ना है कि
सूरज
कैद हो मेरी मुट्ठी में
हालांकि
मुझे भाता है
दोनों का ही स्वरूप।
 
सचमुच
आकाश की विशालता भी
मुग्ध करती है
लेकिन
तीनों का एकाकीपन
अक्सर
बहुत खलता है
शायद इसीलिए
मैंने कभी नहीं चाहा कि
हो सकूं
चांद/सूरज और आकाश जैसा।
 
क्योंकि
मैं घुलना चाहता हूं
खेतों की सौंधी माटी में
गतिशील रहना चाहता हूं
किसान के हल में।
 
खिलखिलाना चाहता हूं
दुनिया से अनजान
खेलते बच्चों के साथ।
 
हां, मैं चहचहाना चाहता हूं
सांझ ढले/घर लौटते
पंछियों के संग-संग।
 
चाहत है मेरी
कि बस जाऊं/वहां-वहां
जहां
सांस लेती है ज़िंदगी
और/यह तभी संभव है
जबकि
मेरे भीतर ज़िंदा रहे
एक आम आदमी।
 
लेखक के बारे में
सुबोध श्रीवास्तव
परिचय : जन्म- 4 सितंबर 1966, शिक्षा- परास्नातक। 'आज' (हिन्दी दैनिक), कानपुर में कार्यरत। कई पुस्तकों का प्रकाशन, देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। दूरदर्शन, आकाशवाणी से प्रसारण। गणेश शंकर विद्यार्थी अतिविशिष्ट सम्मान प्राप्त तथा 'काव्ययुग' ई-पत्रिका का संपादन।.... और पढ़ें

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