biodatamaker

हिन्दी कविता : रूठा बसंत

Updated: शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022 (12:24 IST)
- सविता चौधरी





धरती निर्वसन सी अब क्यों दिखती…
खो गया कहां सौंदर्य तुम्हारा..
धूमिल हुए ओढ़नी के रंग सारे,
बदरंग हुए ऋतुओं के रंग सारे। 
        
हूक उठी चिमनी के धुंए-सी
चीख उठी तुम 
वाहन के कोलाहल सी,
ढूंढती तुम कहां
अपने ऋतुराज बसंत को।
 
बालक पूछें, बालिका पूछें...
मां कौन यह ऋतुराज बसंत,
धरती की चूनर कहां रंग-बिरंगी,
देखो ना तुम मां, धरती कांप रही,
उच्छवास से अट्टालिकाएं हिल रहीं
धरती की इस दुर्दशा पर,
बहाता अंबर अम्लीय वर्षा के खारे आंसू।
 
मां यह कैसी वंदना के स्वर?
बस विद्यालय में गूंज रहे…
सरस्वती जी रूठी जन-जन से.. 
मानव, मानव को ही लील रहे
शर्मसार और धिक्कार तुम्हें मानव,
बच्चे ऋतुराज बसंत को ढूंढ रहे !

Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

इंदौर में आयोजित होगा राज्य स्तरीय- लक्ष्य मंथन योगासन प्रतियोगिता

दिलों को जोड़ने की एक मुहिम: जानिए राजीव गांधी की जयंती और 'सद्भावना दिवस' का कनेक्शन

आसमान से बरसेगा सेहत या संकट? जानिए बारिश का पानी पीने का सच!

Ebola Virus: क्या है इबोला वायरस? जानिए इसके लक्षण, संक्रमण और बचाव के आसान उपाय

बड़बोले ट्रंप की घटिया बेशर्मी, अंकारा में नहीं था Trump को कोई खतरा

अगला लेख