sundarkand
Mon, 17 Aug 2026

Notifications

  1. लाइफ स्‍टाइल
  2. साहित्य
  3. काव्य-संसार
  4. Poem

हिन्दी कविता : अफसोस

poem
देख आज के हालात
सिर पकड़ बैठ जाता हूं
 
सब ओर लाचार बेचारी 
दीनता हीनता है
गरीबी और बेबसी है
फिर अफसोस क्यों ना हो
 
बचपन जब हो भूखा प्यासा
ना हो खाने को दाना 
क्यों ना हो अफसोस
कल की बात
शहर का मुख्य चौराहा
वाहनों की लंबी 
लंबी सी कतारों के बीच
 
जीर्णशीर्ण बसन छिद्रों से भरी
मांगती बस
गोद में लिए बच्चे की खातिर 
दस बीस रूपए 
 
यह मेरे भारत की तस्वीर 
बस अफसोस 
वो पालिटिशियन
खीचतें खाका देश का
 
उस महिला का कोई
अस्तित्व नही इस मेप में 
काश
उसकी दीनता गरीबी
 
ख्वाहिश अभिलाषा 
स्तर के लिए काश
निर्धारित कोई स्थान होता
बस देख अफसोस 
होता है
 
अफसोस होता है
देखकर वह वृद्धा
जो सड़क के फुटपाथ 
साइड से सूखे भूसे 
 
टाट पट्टी का 
जो उसकी अवस्था 
की तरह जीर्णशीर्ण 
तार तार है
 
बस बना आशियाना
भावी जीवन का
दिनों को काटती है
बस देख अफसोस 
 
होता है अफसोस 
क्योंकि 
मर्द कहलाने वाला 
जन्तु जो उसकी कोख से
पैदा हो बड़ा हुआ
 
नहीं रख सकता
पर क्यूं 
शायद प्यार बंट गया 
पत्नी में, बच्चों में
आफिस में दोस्तों में
 
कितने ही टुकड़ों में बांट डाला उसने 
मां का वो प्यार
मिला जो जन्म से जवान होने तक
देख होता बस अफसोस