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कविता : मैं ! नीर भरी कुंज लतिका-सी

Written By WD
Updated: गुरुवार, 21 जुलाई 2016 (11:45 IST)
निशा माथुर 
मैं ! नीर भरी कुंज लतिका-सी 
सांस-सांस महकी चंदन हो गई
छुई-अनछुई नवेली कृतिका-सी
पिय से लिपटन भुजंग हो गई!
 
अंगनाई पुरवाई महके मल्हार-सी 
रूप-रूप दर्पण मधुबन हो गई
प्रियतम प्रेम में अथाह अंबर-सी
मन राधा-सी वृंदावन हो गई!
 
गात वल्लरी हिल-हिल हर्षित-सी
तरुवर तन-मन पुलकन हो गई
मैं माधवी मधुर राग कल्पित-सी
मोहनी मूरत-सी मगन हो गई!
 
अनहद नाद उर की यमुना-सी
मन तृष्णा विरहनी अगन हो गई
भीगी अलकों की संध्या यौवना-सी
दृग नीर भरे नैनन खंजन हो गई!
 
मैं! विस्मित मौन विभा के फूल-सी
बूंद-बूंद घन पाहुन सारंग हो गई
बिंदिया खो गई मेरी सूने कपोल 
सांसों से महकी अंग अंग हो गई !
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