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हिन्दी कविता : खनकती ख्वाहिशें....

तरसेम कौर
पर्स में रखे चंद नोटों और 
कुछ खनकते सिक्कों
जितनी ही बच गई हैं ख्वाहिशें
और दिन चढ़ते वो भी हो जाती हैं पराई
 
कभी दूध के पैकेटों तो 
कभी सब्जी वाले के ढेले तक 
ही पहुंच पाती हैं चंद खनकती ख्वाहिशें 
दब जाती है खनखनाहट उनकी
कुकर की सीटी की आवाज में 
 
या कभी बेल दी जाती हैं 
चकले और बेलन के बीचोंबीच
दहलीज पर खड़ी हो तकती हैं 
उन बंद सी राहों को 
जो न कभी खुलेंगी 
 
जहां वो खनकती ख्वाहिशें
ऊंची एड़ी की सैंडल पहन कर
दूर निकल जाना चाहती हैं 
इतराती हुई और कुछ अकड़ती हुई सी
 
आसमानों को धरती पर ले आने की ख्वाहिशें 
बस ठहरी रहती हैं आंखों में बादल-सी बनकर
या लिपटी रहती हैं बदन से आंचल-सी बनकर..!!

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