suvichar

हिन्दी कविता : खनकती ख्वाहिशें....

Updated: गुरुवार, 14 जुलाई 2016 (12:03 IST)
पर्स में रखे चंद नोटों और 
कुछ खनकते सिक्कों
जितनी ही बच गई हैं ख्वाहिशें
और दिन चढ़ते वो भी हो जाती हैं पराई
 
कभी दूध के पैकेटों तो 
कभी सब्जी वाले के ढेले तक 
ही पहुंच पाती हैं चंद खनकती ख्वाहिशें 
दब जाती है खनखनाहट उनकी
कुकर की सीटी की आवाज में 
 
या कभी बेल दी जाती हैं 
चकले और बेलन के बीचोंबीच
दहलीज पर खड़ी हो तकती हैं 
उन बंद सी राहों को 
जो न कभी खुलेंगी 
 
जहां वो खनकती ख्वाहिशें
ऊंची एड़ी की सैंडल पहन कर
दूर निकल जाना चाहती हैं 
इतराती हुई और कुछ अकड़ती हुई सी
 
आसमानों को धरती पर ले आने की ख्वाहिशें 
बस ठहरी रहती हैं आंखों में बादल-सी बनकर
या लिपटी रहती हैं बदन से आंचल-सी बनकर..!!
लेखक के बारे में
तरसेम कौर
Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

इंदौर में आयोजित होगा राज्य स्तरीय- लक्ष्य मंथन योगासन प्रतियोगिता

दिलों को जोड़ने की एक मुहिम: जानिए राजीव गांधी की जयंती और 'सद्भावना दिवस' का कनेक्शन

आसमान से बरसेगा सेहत या संकट? जानिए बारिश का पानी पीने का सच!

Ebola Virus: क्या है इबोला वायरस? जानिए इसके लक्षण, संक्रमण और बचाव के आसान उपाय

बड़बोले ट्रंप की घटिया बेशर्मी, अंकारा में नहीं था Trump को कोई खतरा

अगला लेख