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हिन्दी कविता : इन दिनों...

Updated: शुक्रवार, 31 मार्च 2017 (12:38 IST)
व्यर्थ बढ़ गई है कांव-कांव,
कौए मगर दिखते नहीं। 
दोस्त बेहिसाब बनते हैं,
दिल में मगर बसते नहीं। 
 
आंखों को सुंदर लगते,
मन को भी भाते हैं। 
खुशबू की खातिर, 
लोग इत्र लगाते हैं।
 
पेड़-पौधे फ्रेमों में रखते,
पत्ते जहां गिरते नहीं।
 
नन्ही-सी गोरैया प्यारी,
प्लास्टिक की बनाते हैं।
कृत्रिम घोंसले में रख,
घर को सजाते हैं।
 
चूं-चूं चिड़िया की मीठी,
घंटी भी वहीं लगाते हैं।
चुगकर गा पाए चिड़िया,
दाना वो रखते नहीं।
 
बातें बहुत सुंदर-सुंदर,
सुनने को मिलती हैं रोज।
तन सुंदर, घर सुंदर,
जहां पड़े परछाई अपनी।
 
सारा वातावरण सुंदर,
कितनी तहें खोजूं पर,
मन अपने सजते नहीं।
 
लेखक के बारे में
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा
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