होली गीत : होली की 2 कविताएं...


फागुन : रंग-गुलाल भरी पिचकारी
 
फागुन लाग अंग फड़कत है, 
खेलन आयो होली रे। 
रंग-गुलाल भरी पिचकारी, 
भिगा दियो मेरी चोली रे।
 
पकड़ कलाई मेरी मरोड़ी, 
रगड़ दियो दोनों गाल। 
रंग-बिरंगी हो गई मैं तो, 
कियो बुरा ये हाल। 
 
सखी-सहेली मिल करके अब, 
करती जोरा-जोरी रे। 
रंग-गुलाल भरी पिचकारी, 
भिगा दियो मेरी चोली रे।
 
उधर लड़कों की टोली आई, 
हो गई उनसे भेंट। 
इधर-उधर सखिया सब भागी, 
एक ने लिया चहेट।
 
पाय अकेले कहन लगा कि, 
रगडूंगा आज हे गोरी रे।
रंग-गुलाल भरी पिचकारी, 
भिगा दियो मेरी चोली रे। 
 
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