मार्मिक कविता : पीड़ा

rape


दिलीप गोविलकर, खंडवा (मप्र)

अमानवीयता की आग में झुलस रहा है मेरा हृदय
कभी पत्थर-सा था अनुशासित, अडिग
आज क्रंदन कर रहा है।
चारों ओर पसरी असहनीय वेदनाओं के जकड़न में
उलझा है मेरा हृदय
दो राहें पर खड़ा से विचलित
द्रवित है मेरा हृदय।

क्या इतनी हावी हो सकती है वासना
जो बन जाए
क्या निरीह, अबला, सब पशुता की भेंट चढ़ जाए।
नहीं चाहिए ऐसा समाज मुझे
जहां मानवीयता पल-पल हो तार-तार
जहां पैसे और सत्ता के सुख में डूबे
हाथी हो मदमस्त हजार।

हे ईश्वर! मोम से पिघलते इस हृदय को अब और नहीं चाहिए करुणा
डर है मुझे असंवेदनशीलता के घने अंधेरे में
यह हृदय फिर कठोर न हो जाए।



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