Daily Horoscope
✕

हिन्दी कविता : पतझड़ की एक कली...

Updated: सोमवार, 10 अप्रैल 2017 (14:07 IST)
मैं पतझड़ की एक कली, 
तुम चाहो तो खिल जाऊं।
पर ऐसी मेरी चाह नहीं, 
माले में गुंथी जाऊं।
 
एक यही बस अभिलाषा, 
मैं सबको गले लगाऊं।
मैं पतझड़ की एक कली,
तुम चाहो तो खिल जाऊं।
 
इन नन्ही-नन्ही कलियों संग, 
मैं झूम-झुमकर गाऊं।
उस विकल प्यार की आभा का, 
मैं सुन्दर राग सुनाऊं।
 
मोती मैं ना बनूं कभी, 
धागे में गुंथी जाऊं।
मैं पतझड़ की एक कली, 
तुम चाहो तो खिल जाऊं।
 
आंगन की किलकारी बन, 
मैं सबको अंग लगाऊं।
साथ मिले गर पत्थर का, 
तो उसको भी पिघलाऊं।
 
आंखों में हो शर्म-हया,
मैं सद्गुण ही अपनाऊं,
मैं पतझड़ की एक कली, 
तुम चाहो तो खिल जाऊं।
 
लेखक के बारे में
रामध्यान यादव 'ध्यानी'
Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

सरदार वल्लभभाई पटेल जयंती पर क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय एकता दिवस?

31 अक्टूबर पुण्यतिथि: इंदिरा गांधी की मृत्यु कब, कहां, क्यों और कैसे हुई थी?

वाणी साहित्य उत्सव का आगाज, पहले दिन युद्ध, स्त्री विमर्श और एआई के दौर में लेखन पर हुआ मंथन

वर्ल्ड स्ट्रोक डे: स्ट्रोक के लक्षण दिखते ही लें चिकित्सकीय सहायता, हर मिनट है कीमती

बौखलाए नेताओं की बेरहमी का ये सबसे निर्दयी उदाहरण है, 200 पेड़ों से हजारों परिंदों के आशियाने उजाड़कर मेट्रो चलाएंगे

अगला लेख