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कविता : मनवा मैं नारी हूं क्यों पीर की

Updated: गुरुवार, 27 जुलाई 2017 (15:10 IST)
ममता भारद्वाज 
 
मनवा मैं नारी हूं क्यों पीर की मारी हूं ?
कुकर्म कर चैन से सोता है नर
क्यों तन मन से हारी हूं मैं ?
मनवा हुआ करती थी, चहल-पहल जिस आंगन की 
क्यों उसी से हुई बेगानी हूं मैं ?
 
जिस आंगन ने पथ पर चलना सिखाया 
क्यों वही निरासो से घिर जाती हूं मैं ?
मनवा मैं नारी हूं क्यों पीर की मारी हूं ?
कुकर्म कर चैन से सोता है नर 
क्यों तन मन से हारी हूं मै ?
 
मनवा गुजरते है नर उसी पहलू से
फिर क्यों वही अत्याचारों से प्रतारित हूं मैं ?
खुलकर जिंदगी जीता है नर
क्यों वही हम पर जमाने की गाली है
मनवा मैं नारी हूं क्यों पीर की मारी हूं ?
 
कुकर्म कर चैन से सोता है नर
क्यों तन मन से हारी हूं मैं ?
मनवा जिससे जूरी है जिंदगी का हर ख्वाब अपना
क्यों वही हर जख्म का शिकार बन जाती हूं मैं ?
 
अपना भी अधिकार है हर कदम पर चलने की
फिर क्यों वही रीत रिवाजों की मारी हूं मैं ?
मनवा मैं नारी हूं क्यों पीर की मारी हूं ?
गुनाह करता है कोई क्यों जंजीरों की भागीदारी हूं मैं ?
 
जहां कुकर्म कर चैन से सोता है नर
क्यों वही तन मन से हारी हूं मैं ?
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