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कविता : एक थी उम्मीद

Updated: बुधवार, 7 जून 2017 (12:11 IST)
“अमिताश्री”
एक थी उम्मीद कि फिर से आ मिलो 
बहती नदी की धार सी काश तुम
आवाज अंतर्मन की तुम सुन ही लोगी 
सागर का ऐसा दृढ़ विश्वास तुम...
 
है पड़ी मिटटी के भीतर सुप्त सी 
कर दो ऐसी नेह की बरसात तुम
फूट कोपल बन उठे दरख्त वो
जिंदगी का मखमली अहसास तुम...
 
पेशानी पर शाम की सिलवटों के बाद
प्रथम प्रहर के नींद सी हो भोर तुम
हो उनींदी आंखों में सपनों के जैसे
आतुर हो सच को ऐसा आभास तुम...
 
किसने बांधा है तुम्हारे वेग को 
मन परिंदा और हो आकाश तुम
नाप लो इस छोर से उस छोर तक
कर लो क्यों ना आज ही आगाज तुम...
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