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निदा फ़ाज़ली : पतझड़ से पहले ही बिखर गया गुल-ए-ख़ास

दिनेश 'दर्द'
अभी मौसम करवट बदल ही रहा था। सूरज की आँच तमाम दरख़्तों की पत्तियों को झुलसा ही रही थी। हर शाख़ के जिस्म पर मुस्कुराती शादाब पत्तियाँ अब ज़र्द होने ही वाली थीं। वो मौसम आ ही गया था, कि जब दरख़्त अपने बदन से ज़र्द पत्तियों का लिबास उतार फेंकें। इसी बीच, आज ख़बर मिली कि पतझड़ से पहले ही मौत ने ज़िंदगी की शाख़ से एक नायाब फूल तोड़ लिया है। वही फूल, जिसे आज गुलचीं (फूल तोड़नेवाला) ने ज़िंदगी के 77 बसंत दिखा कर नोंच लिया। इसी गुल-ए-ख़ास को हम निदा फ़ाज़ली कहते हैं।
वही निदा फ़ाज़ली, जिन्होंने बदलते मौसमों के काग़ज़ पर अपने हुनर की डोर से शायरी के मुख़्तलिफ़ रंगोबू के फूल टाँके। उन्होंने ख़िज़ाँओं का ज़िक्र भी किया, तो इस अंदाज़ में कि पढ़ने वाले की साँसें मुअत्तर हो जाएँ। समाज की तल्ख़ सच्चाइयाँ भी बयाँ की, तो ऐसे कि हर ख़तावार को अपनी ख़ता का एहसास भी हो जाए और वो ईमानदारी से पशेमानी भी महसूस करे। उन्होंने शाइरी की कई विधाओं में क़लम चलाकर अदब की ख़िदमत की, तो फ़िल्मी दुनिया के लिए भी कई धुनों में नग़्मे पिरोए। ग़ज़ल, गीत और नज़्म के साथ-साथ उन्होंने दोहे रचकर भी कमाल किया। उनके लिक्खे दोहे इस क़दर सहल हैं कि हर ज़ुबान पर किसी बहते हुए दरिया की तरह रवाँ हो पड़ें। और, मानीख़ेज़ ऐसे कि पढ़ने वाला उनके अर्थों को खोजने के लिए अपने अंतर्मन में उतरता ही चला जाए। एक-इक लफ़्ज़ बोलता-सा लगता है उनकी शाइरी का।
 
निदा फ़ाज़ली के जाने से अदब को ख़ासा नुकसान हुआ है। उनके जाने का दर्द, अदब में दिलचस्पी रखने वाली आम अवाम को तो है ही, साथ ही उनको  भी है, जिनके दु:ख-दर्द-तकलीफ़ों को निदा साहब ने लफ़्ज़ दिए। बहुत मुमकिन है कि यही तकलीफ़ वो अदीब भी महसूस कर रहे हों, जिन्होंने कभी  उनके साथ मंच साझा किए थे। जिन्होंने कभी उनके साथ मिलकर मुशायरे की शक्ल में सारी-सारी रात लफ़्ज़ों के उजाले किए थे। मौत के अंधेरों में खो  चुके अपने उसी साथी के खोने का दर्द, देश-दुनिया के कुछ बड़े शाइरों ने 'वेबदुनिया' के साथ भी बाँटा।
 
 
उर्दू अदब की अहम और मोतबर आवाज़ :  प्रो. वसीम बरेलवी 
मुमकिन है, कल सारे अख़बारात सुर्ख़ी ये लगाएंगे कि निदा साहब नहीं रहे। व्यक्तिगत तौर पर ये उर्दू अदब का बहुत बड़ा नुकसान है कि निदा साहब नहीं रहे। लेकिन फिर मैं निदा साहब की मौत तस्लीम नहीं करता। मेरा मानना है कि निदा साहब शारीरिक तौर पर ज़रूर नहीं रहे, लेकिन वो हमेशा रहेंगे। वो अपने काम, अपनी कविता, अपनी नज़्मों, अपने दोहों की वजह से हमेशा ज़िंदा रहेंगे। वो उर्दू शाइरी की अहम और मोतबर (विश्वसनीय) आवाज़ थे। उनके साथ क़रीब 45 बरस का साथ रहा है।
 
अभी 31 जनवरी को ही तो साथ थे हम। गोरखपुर महोत्सव में एक ही मंच साझा कर रहे थे। भयानक ठंड के साथ-साथ कोहरा भी ज़बरदस्त था। कोहरे का आलम ये था कि पढ़ते वक़्त हम ऑडीयंस को नहीं देख पा रहा था। ऑडीयंस ठीक-ठीक नज़र न आने के बावज़ूद निदा साहब ने पूरी ईमानदारी से कलाम पेश किए। जवाब में ऑडीयंस की ओर से आ रही आवाज़ों और तालियों ने अपनी मौजूदगी का एहसास करवाया। दरअसल, वो ऐसे साहित्यकार  थे, जिन्हें अदब से मुतअल्लिक़ अपनी सारी ज़िम्मेदारियों का एहसास था। होता यूँ है कि कुछ लोग पत्रिकाओं के होकर रह जाते हैं और कुछ लोग मंच के होकर रह जाते हैं। मगर निदा फ़ाज़ली साहब की ख़ूबी ये थी कि चाहे उन्होंने दोहे कहे हों, चाहे उन्होंने आसान ज़बान की ग़ज़लें कही हों और चाहे नज़्में कही हों, किसी भी विधा में देखिए उनके यहाँ अपनेआप को अवाम से जोड़ने का एक माद्दा नज़र आता है। उनकी शायरी तो क़ाबिल-ए-क़द्र है ही, उनका गद्य भी अपनी ओर आकर्षित करने वाला है। बहुत डूबकर वो लिखा करते थे। व्यंग्य का भी ख़ूब उम्दा इस्तेमाल करते थे। उन्होंने ज़िंदगी की तल्ख़ियों को जीया और उसका शाइरी बनाया, ये उनका बड़ा कारनामा था।
 
जगजीतजी के साथ भी उनका नाम मज़बूती से जुड़ा है। वो भी उसी दौर में मुंबई पहुँचे जब जगजीतजी अपनी आज़माइशों लेकर वहाँ पहुँचे थे। उसके बाद निदा साहब को शाइरी में मकाम मिला, जगजीतजी को गायकी में मकाम मिला। दोनों ने दोस्ती भी ख़ूब निभाई। जगजीतजी ने निदा साहब की कई ग़ज़लें गाईं। फ़िल्मों से भी उनका जुड़ाव रहा। ''वालिद की वफ़ात पर'' उनकी मार्के की नज़्म है। उर्दू अदब की क़ीमती नज़्मों में उसका शुमार होता है।
 
 
फारसी ज़बान ओढ़े हुए उर्दू को आसान बनाया :  राहत इंदौरी 
निदा फ़ाज़ली साहब की मौत लिटरेचर का बड़ा ख़सारा (नुकसान) है, जिसकी भरपाई होना नामुमकिन ही है। वो इसलिए क्योंकि पिछले 700-800 सालों  से उर्दू शायरी के जो फ्रेम बने हुए थे, जिसके साँचे कई सौ बरस से चले आ रहे थे उससे उन्होंने परहेज़ किया। अलग से एक कैनवस तैयार किया शायरी के लिए। उन्होंने फारसी ज़बान ओढ़े हुए उर्दू थी, उससे अलग हटकर उन्होंने शाइरी को आसान बनाया। उन्होंने हिन्दुस्तान के एक मज़दूर, एक आम आदमी जिस बोली में बात करता है, उसी बोली में शायरी की। इसी बोली में उन्होंने किताबें लिक्खीं। इसी बोली में उन्होंने मज़ामीन (लेख/निबंध का बहुवचन) लिक्खे। इसी ज़बान में उन्होंने गीत, ग़ज़ल, दोहे के साथ साथ-साथ फ़िल्मी गाने लिक्खे, जो कि बड़ा काम है। बड़े से बड़ा फ़ल्सफ़ियाना ख़याल  क्यों न हो, इतनी आसाब ज़बान में कह देते थे कि जिसे समझने में कोई मुश्किल नहीं होती। बड़े से बड़ा मसअला हो, चाहे सियासत का,  हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का, कश्मीर का, महब्बत का, दोस्ती का, नफ़्रत का, तमाम बातें अपनी ज़बान में करते थे। उनकी ज़बान, उनकी शायरी को  समझने के लिए किसी लुग़त (शब्दकोश) की या डिक्शनरी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। ये उनकी ख़ासियत थी।
 
जहाँ तक उनकी शख़्सियत का सवाल है, वो बिल्कुल बहुत ही ज़बरदस्त पुरमज़ाक आदमी थे, जहाँ रहते थे सिर्फ़ कहकहे ही बिखेरते रहते थे। हर दूसरे  जुमले में उनका कोई न कोई कहकहा होता था। क़रीब 40 साल से उनके साथ मुशायरे पढ़ रहा हूँ हिन्दुस्तान में और हिन्दुस्तान के बाहर भी। ऐसी हर  रात, जो साथ गुज़ारी है हमने। अगर एक-इक रात की कहानी लिक्खी जाए, तो एक-इक किताब बन सकती है। लिहाज़ा, एक जुमले में तो उनकी शख़्सियत के बारे में नहीं कह सकता। वो तो अपनेआप में अनोखे ख़ास इंसान थे ही। मगर इतना ज़रूर कहूँगा कि उनकी पोर-पोर से शाइरी टपकती थी, झलकती थी। उनकी गुफ़्तगू से, उनके अंदाज़ से, उनके बातचीत करने के ढंग से, उनके चलने से, फिरने से, उठने से, बैठने से, खाने से और ख़ासतौर पर पीने से, वो निदा फ़ाज़ली दिखाई देते थे।
 
नई  गजल  को  मज़बूत लहजा  दिया  :  डॉ. ज़िया राना 
कुछ एक मुशायरे पढ़े हैं उनके साथ। शायद मंदसौर मुशायरे में हम साथ थे। उर्दू ग़ज़ल के जदीद (नवीन) लबोलहजे के नुमाइंदा शायर थे। 21वीं सदी की  ग़ज़ल की ज़ुल्फ़ें सँवारने में उनका अहम योगदान रहा है।

डॉ. बशीर बद्र और शहरयार के सिलसिले के शाइर थे वो भी। नई ग़ज़ल को बहुत मज़बूत और  ताकतवर लहजा अता किया उन्होंने। उन्हीं का एक शे'र है-
 
 
कच्चे बखिए की तरह रिश्ते उधड़ जाते हैं,
हर नए मोड़ पर कुछ लोग बिछड़ जाते हैं
भीड़ से कट के न बैठा करो तन्हाई में,
बेख़्याली में कई शहर उजड़ जाते हैं।
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