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कुंवर नारायण : विश्व कविता के अनुवाद पर अनूठी पुस्तक देने वाले

Updated: बुधवार, 15 नवंबर 2017 (14:00 IST)
खबर दुखी कर देने वाली है। साहित्य संसार में सन्नाटा है कि काव्य संसार के एक प्रमुख हस्ताक्षर कुंवर नारायण नहीं रहे। प्रस्तुत है उनकी स्मृति में उनकी रची कविता और उनके अनुवाद पर पिछले दिनों आई पुस्तक की समीक्षा....  
 
 
कुंवर नारायण की कविता 
सतहें इतनी सतहीं नहीं होती
 
न वजहें इतनी वजही
 
न स्पष्ट इतना स्पष्ट ही 
 
कि सतह को मान लिया जाए कागज
 
और हाथ को कहा जाए हाथ ही। 
 
जितनी जगह में दिखता है एक हाथ 
 
उसका क्या रिश्ता है उस बाकी जगह से
 
जिसमें कुछ नहीं दिखता है? 
 
क्या वह हाथ 
 
जो लिख रहा 
 
उतना ही है
 
जितना दिख रहा? 
 
या उसके पीछे एक और हाथ भी है
 
उसे लिखने के लिए बाध्य करता हुआ?
* आज सारे दिन बाहर घूमता रहा 
 
और कोई दुर्घटना नहीं हुई। 
 
आज सारे दिन लोगों से मिलता रहा
 
और कहीं अपमानित नहीं हुआ। 
 
आज सारे दिन सच बोलता रहा 
 
और किसी ने बुरा नहीं माना। 
 
आज सबका यकीन किया 
 
और कहीं धोखा नहीं खाया। 
 
और सबसे बड़ा चमत्कार तो यह 
 
कि घर लौटकर मैंने किसी और को नहीं 
 
अपने ही को लौटा हुआ पाया।
कुंवर नारायण भारत ही नहीं विश्व के श्रेष्ठ कवियों में से थे। विश्व साहित्य के गहन अध्येता कुंवर नारायण ने आधी सदी से अधिक समय में अनेक विदेशी कवियों की कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया, जो समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। ‘न सीमाएं न दूरियां’ उनमें से कुछ उपलब्ध अनूदित कविताओं का संकलन है - हालांकि सारे अनुवाद, खासतौर से शुरुआती अनुवाद, खोजे नहीं जा सके।
 
जो बात इस पुस्तक को सबसे अनूठी और विशिष्ट बनाती है, वह यह है कि इसमें प्राचीन से लेकर अब तक के अनेक उत्कृष्ट विश्व कवियों की कविताओं के अनुवाद स्वयं आज के श्रेष्ठ हिन्दी कवि द्वारा किए गए हैं। इस संकलन का एक और विशिष्ट पक्ष विभिन्न कवियों पर सारगर्भित बातें और अनुवाद-संबंधी टिप्पणियां भी है। कुंवर नारायण के लिए‘अनुवाद का मतलब कविता की भाषाई पोशाक को बदलना भर नहीं रहा है, बल्कि उसके उस अंतरंग तक पहुंचना रहा है, जो उसे कविता बनाता है।’उन्होंने अनुवाद की अवधारणा को अनुरचना की हद तक विस्तृत किया है और अनुवाद-कर्म को अपनी रचनात्मकता की तरह ही महत्त्व दिया है।”
 
अनुवाद करने के साथ अनुवाद-प्रक्रिया के रहस्यों का प्रकटन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जिसे बोर्हेस और कुंवर नारायण के यहां हम अनुवाद-प्रक्रिया पर की गई दुर्लभ टिप्पणियों में देख सकते हैं। यहां अनुवादों में वह समावेशी दृष्टि अहम है, जो कुंवर नारायण के संपूर्ण लेखन में मौजूद है। अनुवाद के लिए जिस कवि को उन्होंने चुना, थोड़ा उसके प्रभाव में ढले, थोड़ा उसे अपने प्रभाव में ढाला। अनुवाद-कर्म के विशेष महत्व को रेखांकित करती यह किताब नई पीढ़ी के लिए एक अनूठा दस्तावेज है।

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