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हिन्दी की मजबूरियां

गरिमा संजय दुबे
हमारी पड़ोसन बड़ी ही अभिजात्य, एलिट क्लास और कान्वेंट में पढ़ी लिखी, और हम ठहरे गांव के सरकारी हिन्दी माध्यम स्कूल की पैदाईश। लेकिन जिज्ञासा को ही अपनी ताकत बना कर साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा। अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर कर अंग्रेजी के प्राध्यापक भी हो गए, लेकिन जब लेखन की बारी आई तो अपनी मातृ भाषा में ही लिखना रास आया।



भावनाओं की अभिव्यक्ति हमने हिंदी में करना प्रारंभ कर दी, पर हमें क्या पता था कि हमारा मातृ भाषा के प्रति प्रेम एलिट क्लास में आलोचना का विषय बन जाएगा। वैसे तो हमारी पड़ोसन सिवाए फिल्म, मेकअप और फैशन के कुछ खास बौद्धिक दखल नहीं रखती, लेकिन अपनी कान्वेंट अंग्रेजी को उन्होंने अभिव्यक्ति से अधिक प्रभाव का माध्यम बना रखा है। उनकी नजर में अंग्रेजी न आना इस संसार का सबसे बड़ा गुनाह है। 
 
जब हमारे लेख प्रकाशित होने लगे तो लाजमी है चर्चा भी हुई होगी। एक दिन धमक पड़ी हमारे घर और अपने अंग्रेजी अंदाज में हिन्दी बोलते हुए कहने लगी- “अंग्रेजी पढ़ाती हैं, अंग्रजी में ही पीएचडी की है, फिर आप हिंदी में क्यों लिखती है? मैंने जवाब दिया- “क्योंकि मुझे अच्छा लगता है”। वे व्यंग्य से मुस्कुरा दी, कहने लगी - “समझ सकती हूं डिग्री अलग बात है और कमांड अलग चीज। आप ठहरी गांव की पढ़ी लिखीं, शायद इंग्लिश में उतना कम्फर्ट फील नहीं करती होंगी”। मैंने मुस्कुरा कर कहा -“ शायद” , वे चल दीं, मोहल्ले भर में हिन्दी अंग्रेजी पर मेरे लेखन पर विशेष टिपण्णी के साथ। मैंने सफाई देना उचित नहीं समझा, क्योंकि इस बीमारी से तो पूरा भारत वर्ष ग्रसित है। 
 
शायद योग जिस तरह योगा होकर लौटा है, भविष्य में अमेरिकन शिक्षक “हिन्डी” सिखाएंगे, तब हिन्दी भी फैशन में आ जाएगी। हमें इंपोर्टेड वस्तुएं ही भाती हैं। खैर हर हिंदी लेखक की तरह अंग्रेजी के सामने कम होते प्रभाव को देख हम भी उदास हो गए। पड़ोसन कई सामाजिक संस्थाओं की सदस्य थी। संस्था तरह-तरह के सामाजिक सरोकारों के कार्यक्रम आयोजित करती रहती थी। अब यह अलग बात है कि इन कार्यक्रमों का स्वरूप सामाजिक कम किटी पार्टी नुमा अधिक होता था। लेकिन फिर भी “नि मामा से काना मामा भला” की तर्ज पर वे कुछ तो कर रहे हैं, सोचकर मैं आलोचक नहीं होती।

इनमें से किसी सदस्य को समाज में बढ़ती हिन्दी की दुर्गति के प्रति चिंता से प्रेरणा मिली और संस्था ने हिन्दी दिवस पर परिचर्चा का आयोजन किया, जिसमें मुझे भी आमंत्रित किया गया। नि‍यत समय पर जब मैं पहूंची, तो देखा कि पूरी संस्था ही मेरी पड़ोसन की तरह की महिलाओं से भरी पड़ी थी। उनके अंग्रेजी बोलने की कोशिश में चेहरे की सारी मांस पेशियों की कसरत होते देख मैं चकित थी। कहर शब्द को इतना चबा-चबा कर बोला जा रहा था कि मेरा जबड़ा उन्हें देख-देख कर दुखने लगा। साफ था, अपनी अंग्रेजी को भी वे  सहज होकर नहीं स्टाइल से बोल रही थी।
 
 मेरा नाम पुकारे जाने पर मैंने अपने विचार रखे, तालियां बजाना तो मजबूरी थी सो बजी, फिर टूटी फूटी हिन्दी और उतनी ही टूटी फूटी अंग्रेजी में कार्यक्रम हुआ। मेरी हिन्दी थोड़ी कमजोर है कहना जैसे एक फैशन है आजकल। अंत में मैंने अपने लिए दो मिनट और मांगे और धाराप्रवाह अंग्रेजी में अपने मन की भड़ास निकाल दी। लब्बो-लुआब यह था कि मैंने कहा “मैंने जो भाषण दिया वही बात अगर मैंने अंग्रेजी में कही होती तो आप सब मज़बूरी में नहीं दिल से ताली बजाती और यही बात हिन्दी के लिए घातक है।

अफसोस की आज भी वह मानसिकता जस की तस है।” अंग्रेजी में यह बोल मैं नीचे उतर आई। सब मुझे घेर कर तालियां बजा रही थी, अब मुझसे प्रभावित हो कर। मेरा दिल शर्म और ग्लानी से भर गया कि आज भी हिन्दी दिवस पर हिन्दी का महत्व बताने के लिए मुझे अंग्रेजी में बोलना पड़ा। क्या इस सोच को बदले बिना हिन्दी की मर्यादा को पुनः प्रतिष्ठित किया जा सकता है ?

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