ब्लड क्लॉटिंग : कोविड के मरीजों में क्यों है खतरा

blood clotting  
महामारी ने इंसानों को बुरी तरह से निगल लिया है। जो लोग कोरोना पर जंग जीत रहे हैं उनमें अन्य बीमारियां पैदा होने लगी है। जिन्हें डायबिटीज नहीं थे वह मरीज भी ठीक होने के बाद शुगर की चपेट में आ रहे हैं। इस बीमारी से बचाव के लिए अथक प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन इसका प्रकोप अभी भी जारी है। अब कोविड से ठीक हुए मरीजों में खून के थक्के जमने की बीमारी सामने आई है। जिसे ब्लड क्लोटिंग या थ्रोम्बोसिस कहते हैं।
 
क्या और कैसे होती है ये बीमारी? 
 
विशेषज्ञों और डॉक्टर के मुताबिक कोरोना वायरस के शरीर में जाने के बाद सूजन आने लगती है। जिससे ह्रदय कमजोर पड़ने लगता है। इसका सीधा असर धड़कन की गति पर पड़ता है और शरीर में धीरे-धीरे खून के थक्के जमने लगते हैं। इसे कहा जाता है। ब्लड क्लॉटिंग की वजह से ह्रदय बहुत कमजोर हो जाता है और क्षमता अनुसार काम भी नहीं कर पाता है जिससे ह्रदयघात होने की संभावना बढ़ जाती है।
 
कोविड मरीजों में खून के थक्के क्यों जम रहे हैं?
 
विश्व स्तर पर एक शोध किया गया है जिसमें सामने आया कि कोविड के 15 से 30 फीसदी मरीजों में यह बीमारी सामने आई है। इसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस कहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार वायरस फेफड़े के साथ खून से भी जुड़ा हुआ है।
 
कहां बनते हैं खून के थक्के? 
 
कोविड पर लगातार जारी शोध के बाद अन्य बीमारियों पर शोध जारी है। एक शोध में सामने आया है कि करीब 30 फीसदी कोविड मरीजों में यह समस्या सामने आ रही है। रक्त कोशिकाएं पूरे शरीर में होती है इसलिए खून के थक्के कहीं भी बन सकते हैं। 
 
यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड की स्टडी के मुताबिक कोविड के बाद दुर्लभ तरह से खून के थक्कों का खतरा सामान्य से करीब 100 गुना अधिक है। > ALSO READ: Diet Tips : इन 6 चीजों के साथ भूलकर भी न खाएं दही, वरना होगा सेहत को नुकसान> ALSO READ: Summer Drinks: 5 रसीले ड्रिंक्स देंगे तनाव और गर्मी से राहत



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