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प्रेम-पथ हो न सूना
Written By
WD
Updated:
शनिवार, 19 जनवरी 2008 (10:31 IST)
- नीर ज
ND
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलि ए
जिस जगह मैं थकू ँ, उस जगह तुम चलो ।
क़ब्र-सी मौन धरती पड़ी पाँव पर ल
शीश पर है कफ़न-सा घिरा आसमा ँ,
मौत की राह मे ं, मौत की छाँह मे ं
चल रहा रात-दिन साँस का कारवा ँ,
जा रहा हूँ चल ा, जा रहा हूँ बढ़ ा,
पर नहीं ज्ञात है किस जगह ह ो?
किस जगह पग रुक े, किस जगह मगर छुट े
किस जगह शीत ह ो, किस जगह घाम ह ो,
मुस्कराए सदा पर धरा इसलि ए
जिस जगह मैं झरूँ उस जगह तुम खिलो ।
प्रेम-पथ हो नस सूना कभी इसलि ए,
जिस जगह मैं थकू ँ, उस जगह तुम चलो ।
प्रेम का पंथ सूना अगर हो गय ा,
रह सकेगी बसी कौन-सी फिर गल ी?
यदि खिला प्रेम का ही नहीं फूल त ो,
कौन है जो हँसे फिर चमन में कल ी?
प्रेम को ही न जग में मिला मान त ो
यह धर ा, यह भुवन सिर्फ़ श्मशान ह ै,
आदमी एक चलती हुई लाश ह ै,
और जीना यहाँ एक अपमान ह ै,
आदमी प्यार सीखे कभी इसलि ए
रात-दिन मैं ढलू ँ, रात-दिन तुम ढलो ।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलि ए,
जिस जगह मैं थकू ँ, उस जगह तुम चलो ।
एक दिन काल-तम की किसी रात न े
दे दिया था मुझे प्राण का यह दिय ा,
धार पर यह जल ा, पार पर यह जल ा
बार अपना हिया विश्व का तम पिय ा,
पर चुका जा रहा साँस का स्नेह अ ब
रोशनी का पथिक चल सकेगा नही ं,
आँधियों के नगर में बिना प्यार क े
दीप यह भोर तक जल सकेगा नही ं,
पर चले स्नेह की लौ सदा इसलि ए
जिस जगह मैं बुझू ँ, उस जगह तुम जलो ।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलि ए
जिस जगह मैं थकू ँ, उस जगह तुम चलो ।
रोज़ ही बाग़ में देखता हूँ सुब ह,
धूल ने फूल कुछ अधखिले चुन लि ए,
रोज़ ही चीख़ता है निशा में गगन-
' क्यों नहीं आज मेरे जले कुछ दीए ?'
इस तरह प्राण! मैं भी यहाँ रोज़ ह ी,
ढल रहा हूँ किसी बूँद की प्यास मे ं,
जी रहा हूँ धरा प र, मगर लग रहा
कुछ छुपा है कहीं दूर आकाश मे ं,
छिप न पाए कहीं प्यार इसलि ए
जिस जगह मैं छिपू ँ, उस जगह तुम मिलो।
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