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ग़ालिब का ख़त-8

Written By WD
Updated: बुधवार, 23 जुलाई 2008 (14:54 IST)
अजब तमाशा है। बाबू साहिब लिख चुके हैं कि हरदेव सिंह आ गया और पाँच सौ रुपए की हुंडी लाया। मगर उसके मसारिफ़ की बाबत उनतीस रुपए कई आने उस हुंडी में महसूब हो गए हैं। सौ मैं अपने पास से मिलाकर पूरे पाँच सौ की हुंडी तुझको भेजता हूँ।

Aziz AnsariWD
मैंने उनको लिखा कि मसारिफ़ हरदेवसिंह के मैं मुजरा दूँगा, तकलीफ़ न करो। '25' ये मेरी तरफ़ से हरदेवसिंह के और दे दो और बाक़ी कुछ कम साढ़े चार सौ की हुंडी जल्द रवाना करो। सो भाई, आज तक हुंडी नहीं आई।

मैं हैरान हूँ। वजह हैरानी की यह कि उस हुंडी के भरोसे पर क़र्ज़दारों से वायदा जून के अवायल का किया था। आज जून की पाँचवीं है। वह तक़ाजा़ करते हैं और मैं आज, कल कर रहा हूँ। शर्म के मारे बाबू साहिब को कुछ नहीं लिख सकता।

  लिफ़ाफे़ ख़तूत के जौ मैंने भेजे थे, वह भी अभी नहीं आए। बाईंहमांयह कैसी बात है कि मैं यह भी नहीं जानता कि बाबू साहिब कहाँ पर हैं, पहाड़ पर हैं, या भरतपुर आए हैं? अजमेर आने की तो ज़ाहिरा कोई वजह नहीं है।      
जानता हूँ कि वह सैकड़ा पूरा करने की फिक्र में होंगे। फिर वे क्यों इतना तकल्लुफ़ करें? तीस रुपए की कौन-सी ऐसी बात है? अगर मसारिफ़-ए-हरदेवसिंह मेरे हाँ से मुजरा हुए तो क्या ग़ज़ब हुआ? उनतीस और पच्चीस, चौवन रुपया निकाल डालें बाकी़ इरसाल करें।

लिफ़ाफे़ ख़तूत के जौ मैंने भेजे थे, वह भी अभी नहीं आए। बाईंहमांयह कैसी बात है कि मैं यह भी नहीं जानता कि बाबू साहिब कहाँ पर हैं, पहाड़ पर हैं, या भरतपुर आए हैं? अजमेर आने की तो ज़ाहिरा कोई वजह नहीं है। नाचार कसरत-ए-इंतज़ार से आजिज़ आकर आज तुमको लिखा है। तुम इसका जवाब मुझको लिखा। और अपनी राय लिखो कि वजह दिरंग की क्या है, ज्यादा-ज्यादा।

5 जून 1853 ई. असदुल्ला

भाई,
जिस दिन तुमको ख़त भेजा़ तीसरे दिन हरदेवसिंह जी अर्जी और '25' की रसीद और '500' की हुंडी पहुँची। तुम समझे? बाबू साहिब ने '25' हरदेवसिंह को दिए और मुझसे मुजराना लिए। बहरहाल, हुंडी 12 दिन की मिआदी थी। छह दिन गुजर गए थे, छह दिन बाकी थे। मुझको सब्र कहाँ? मित्ती काटकर रुपए ले लिए। कर्ज मुतफ़रिक़ सब अदा हुआ। बहुत सुबुकदोश हो गया।

आज मेरे पास '47' नक़द बक्स में और चार बोतल शराब की और तीन शीशे गुलाब के तोशाख़ाने में मौजूद हैं। भाई साहिब आ गए हों तो मीर क़ासिम अली खाँ का ख़त उनको दे दो और मेरा सलाम कहो। और फिर मुझको लिखो, ताकि मैं उनको ख़त लिखूँ। बाबू साहिब भरतपुर आ जाएँ तो आप काहिली न कीजिएगा और उनके पास जाइएगा कि वे तुम्हारे जोया-ए-दीदार हैं।

14 जून 1853 ई. असदुल्ला
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