बाड़मेर में कर्नल और मेजर की जंग

-मुकेश बिवाल

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जसवंतसिंह ने चुनाव लड़ने की खातिर भाजपा को त्याग कर निर्दलीय हो गए हैं, वहीं सोनाराम ने कांग्रेस से बरसों पुराना रिश्ता तोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया है। वैसे भी इन चुनावों में दलबदल का खेल अपने चरम पर है। कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याक्षी हरीश चौधरी जो वर्तमान सांसद भी हैं, राजनीति के इन दोनों वजनी पहलवानों के बीच में फंस गए हैं।

यह सीट राज्य में जहां मुख्यमंत्री के लिए नाक का बाल बनी हुई है, वहीं भाजपा में राष्ट्रीय स्तर पुरानी पीढ़ी को दरकिनार करने वाले अभियान में रोड़े का काम कर रही है। चुनावों के बाद यदि भाजपा नीत एनडीए सरकार बनती है तो उसकी योजना के खाके में जसवंतसिंह शायद मुफीद नहीं बैठते हैं इसीलिए बहुत कोशिश करने और अपने जीवन का अंतिम चुनाव अपनी जन्मस्थली से ही लड़ने की दुहाई काम नहीं आई है।

वसुंधरा राजे ने हालांकि उनके पुत्र की विधायक होने पर तो ऐतराज नहीं किया परंतु संसद के चुनावों में इनकी उम्मीदवारी पर कुंडली मारकर बैठ गईं। वैसे भी जसवंत-वसुंधरा के रिश्तों में खटास राजे के पिछले कार्यकाल के दौरान जसवंत द्वारा की गई असंतुष्ट गतिविधियां के कारण आई है। भाजपा को बाड़मेर के चुनावी अखाड़े के लिए जसवंत के बराबर के एक पहलवान की तलाश थी जो कांग्रेस की सरकार के दौरान असंतुष्ट रहे कर्नल सोनाराम पर जा कर रुक गई।
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लोकसभा चुनावों में राजस्थान से कांटे की टक्कर वाली चंद सीटों में से बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र में जसोल और चौधरी चुनावी अखाड़े में आमने-सामने हैं। दोनों ने चुनाव लड़ने के लिए ही अपने दलों के साथ बरसों पुराना रिश्ता तोड़ दिया था।

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