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संवेदना- कभी हाँ- कभी ना
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मयंक शर्मा संवेदना से भरा है आज, कुछ ज्यादा ही मानव। मधुर नृत्य सब हवा हुए, अब सर्वत्र है तांडव।।जो दिखते हैं पब्लिक में, अति संवेदनशील।उनकी कथित संवेदना, शांति को जाती लील।। फिल्म देखने को गए, मिस्टर मुन्नालाल।हो गए किसी संवाद पर, जमकर पीले-लाल।। '
पिक्चर हाय-हाय' का वहीं, लगे लगाने नारा।फेंक-फेंक कर पत्थर, थिएटर पर था क्रोध उतारा।। आहत थी संवेदना, दंगा कर हो गई शांत।तृत्प हो गए मुन्नालाल, उपद्रव के उपरांत।।**** **** **** **** एक जगह सब सुन रहे, झूम के फिल्मी गाना।तभी हुआ संवेदनशील मुन्नालाल का आना।। गाना सुनते ही उनके मन में हो गए घाव। तोड़ दिया म्यूजिक सिस्टम, आव देखा न ताव।। बात और बेबात ही, वे हो जाते आहत।फिर उनकी संवेदना, दंगे से पाती राहत।। **** **** **** **** एक बार कुछ लोगों ने, जी हाँ, दिन-दहाड़े। एक युवती को घेरकर, उसके कपड़े फाड़े।। कर निर्वसना, नारी को सड़कों पर दौड़ाया।उसे बचाने कोई भी 'संवेदनशील' न आया।। देश में हर पल हो रहे, जुल्म और अनाचार। मुन्नालाल की संवेदना, इधर न करे विचार।। लाभ के लड्डू उसे चाहिए, और प्रचार की बरफी। संवेदना तो सीढ़ी है, लक्ष्य है भइया कुर्सी।। **** **** **** ****