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निर्जला एकादशी को क्यों कहते हैं भीमसेनी एकादशी?

Written By WD Feature Desk
Updated: गुरुवार, 5 जून 2025 (15:50 IST)
Nirjala Ekadashi 2025: ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला और भीमसेनी एकादशी कहते हैं। इस एकाशी का खास महत्व माना गया है। इस दिन जल ग्रहण नहीं करते हैं इसलिए इसे निर्जला कहते हैं। इस एकादशी का व्रत 6 जून 2025 शुक्रवार के दिन रखा जाएगा। निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं।
 
एकादशी तिथि प्रारम्भ- 06 जून 2025 को मध्यरात्रि 02:15 बजे से (5 जून की रात को)।
एकादशी तिथि समाप्त- 07 जून 2025 को तड़के 04:47 बजे समाप्त।
7 जून पारण का समय: दोपहर 01:44 से दोपहर 04:31 तक।
8 जून पारण का समय: सुबह 05:23 से सुबह 07:17 तक।
 
इस एकादशी की कथा इस प्रकार है- जब भीमसेन व्यास जी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु मैं उनसे कहता हूं कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूं, दान भी दे सकता हूं, परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता। अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए।
इस पर व्यास जी कहते हैं कि हे भीमसेन! वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।
 
यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। व्यास जी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। इस दिन 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौ दान करना चाहिए। इस प्रकार व्यास जी की आज्ञानुसार भीमसेन ने वह व्रत किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। 
 
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